शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कारगिल की घाटी : 5


इकबाल के लिखे इस प्रसिद्ध गीत को नोटिस बोर्ड पर लगा दिया गया। 
गीत


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा

हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसिता हमारा। 


घुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन मे

समझो वही हमे भी दिल है जहाँ हमारा ।


परबत वो सब से ऊंचा हमसाया आसमाँ का

वो संतरी हमारा वो पासबा हमारा ।
गोदी मे खेलती है इसकी हजारो नदिया
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा ।


ए अब रौद गंगा वो दिन है याद तुझको

उतर तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ।
मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा ।।

युनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशान हमारा ।
कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी
सदियो रहा है दुश्मन दौर-ए-जमान हमारा ।।

इक्बाल कोइ मेहरम अपना नही जहाँ मे
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा ।।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

कारगिल की घाटी : 4

‘‘हमंे माफ कर दो अनन्या... कहते हुए लड़कियों ने अनन्या को घेर लिया। रूंआसी अनन्या के मुंह से केवल इतना ही फूटा- ‘‘हमें सजा तो मिल ही चुकी है। अब पछताने से क्या फायदा? कल प्रार्थना के बाद नामों की घोषणा होने वाली है.....ऐन मौके पर चयन के एक दिन पहले ही हमारी कक्षा का नाम काट जाता है...... तो?


मध्यान्तर की छुट्टी में सभी लड़किया अटकले लगाने लगी- ‘‘परेड दल के लिए किस किस का नाम चुना जा सकता है....और दल का लीडर कौन कौन हो सकता है?’’

लड़कियों की इस बात पर दीप्ति बोल उठी- ‘‘हमारी ट्रूप लीडर तो अनन्या जैसी होनी चाहिए।’’
‘‘हां, बिल्कुल सही है।’’ 
‘‘हम सबकी भी यही राय है’’ दूसरे सेक्शन की लड़कियों ने भी स्वर मिलाया। सब कहने लगी- ‘‘अनन्या में लीडर के सब गुण है। समझदार होने के साथ सबको साथ लेकर चलना उसे आता है। वह सबसे प्रेम करती है किसी का बुरा नहीं सोचती है......बातूनी लड़कियों की बातें की गाड़ी पटरी पर पटरी बदलती दौड़ी जा रही थी अगर छृट्टी की घंटी न बजी होती तो वे बहुत कुछ बतियाती रहती। 
अपना अपना बैग-बस्ता-टिफन उठाए सब घर जाने को आतुर हुई सबकुछ भूलकर गेट की ओर लपक कर दौड़ पड़ी।
गेट से निकल कर चलती-दौड़ती लड़कियों का रेला ऐसा लग रहा था मानो कैद से छूटकर कैदी भागे जा रहे हो सरपट। सुबह ठीक नौ बजते ही यही लड़कियां घंटी की आवाज पर स्कूल प्रागंण में आ जुटती है- कतारबद्ध होकर अपनी अपनी कक्षाओं की पंक्ति में अलग-अलग लाईन में। छोटी से बड़ी लम्बाई के क्रम में जमी हुई अनुशासन से बंधी हुई सावधान की मुद्रा में प्रार्थना की मुद्रा लिए आंखे बंद कर तल्लीन लड़कियां।  अन्न्या अपनी कक्षा लाईन में सबसे पीछे खड़ी हुई लम्बी लड़की थी। उसकी लम्बे कद के साथ लम्बे बाल, चेहरे पर लिपटी मधुर मुस्कान उसे सौम्य बनाती थी।
दूसरी घंटी बजते ही प्रर्थना प्रारंभ हुई। फिर इसके बाद ताजा समाचारों का वाचन हुआ। फिर पी.टी.आई. मेडम ने अमृत वचन सुनाये। प्रार्थना सभा के विधिवत रूप से पूरा होने के बाद प्रधानाचार्याजी माईक के सामने आकर खड़ी हुई। वे सब छात्रों को संबोधित करके कहने लगी-
‘‘प्यारे बच्चों, तुम्हें यह जानकर ख्ुशी होगी और मुझ व हमारे स्टाफ को भी गर्व होगा कि इस बार 15 अगस्त पर स्टेडियम में होने वाली परेड में हमारे विद्यालय का ट्रूप सबसे आगे होगा....और ट्रूप के आगे होगा हमारे विद्यालय का झंडा थामें ट्रूप लीडर। ट्रूप लीडर उसे चुना जायेगा जो परेड प्रशिक्षण के दौरान अच्दा प्रदर्शन करेगा। इसका निर्णय आपकी पी.टी.आई. मेडम करेगी।
इसके अलावा हमारे विद्यालय की एक छात्रा को स्टेडिय परेड टीम की कमांडर बनाया जायेगा। जिसका चयन सभी स्कूल से जुड़ी चयन समिति करेगी। इस बार स्टेडियम में समूह गान के लिए जो गाना चुना गया है जैसा सभी को मालूम भी है ‘‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा’’ इकबाल का लिख मशहूर यह गीत नोटिस बोर्ड पर पूरा लिखा हुआ है। उसे लिखकर सही तरह से याद कर लें। ताकि कोई त्रुटि ना रहे।
इन सबमें एक खास और अहम बात जो मैं अब बताने जा रही हूं वह है हमारे  शहर के चार विद्यालयों से छात्र-छात्राओं का चुना हुआ एक प्रतिनिधि मंडल स्वाधीनता दिवस पर कारगील की घाटी में शहीद स्मारक पर देश की सेना के जवानों के साथ मनायेगा। प्रधानाचार्याजी की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि लड़कियों में हर्ष की लहर दौड़ गई। तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। कुछ क्षण बाद बड़ी मेडम ने सबको शांत होने का इशारा किया। कुल चार छात्रों को ले जाना तय है। इच्छुक छात्राएं अपना नाम कक्षा टीचर को लिखवा दें। लिखे हुए नामों से ही चयन किया जायेगा। इस दल के साथ स्कूल की अध्यापिका भी रहेगी। बारह दिन के इस टूयर में जम्मू कशमीर की सैर भी करायी जायेगी। यह टूयर 10 अगस्त को उदयपुर से प्रातः सवा छः बजे रेलगाड़ी की यात्रा से प्रारंभ होगा। टूयर की विस्तृत जानकारी सूचना पट्ट पर लगा दी जायेगी। 
इसके  साथ बड़ी मेडम ने अपनी बात को खतम करते हुए आगे निर्देश दिया- ‘‘सभी अपनी अपनी कक्षाओं की ओर प्रस्थान करें।’’
पहले पाश्र्व की पंक्ति बढ़नी शुरू हुई। इसके अंतिम छोर से साथ वाली दूसरी पंक्ति जुड़ती गई। स्व-अनुशासन व स्व-नियंत्रण का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा कि बिना शोर किए एक जैसी यूनीफोर्म पहने कतारबद्ध लड़किया आगे बढ़ती अपनी कक्षाओं के निर्धारित स्थानों पर पहुंच गई। कुछ ही देर बाद शिक्षिकाओं के मुपीछे मुड़ते ही ये नियंत्रण गुम हो गया। लड़किया कक्षा में पहले भीतर घुसने के लिए एक दूसरे को धकियाती हुई शोर मचाने लगी।
अनन्या के साथ दीप्ति ने अपना नाम लिखवाया था। कारगित की घाटी में 15 अगस्त अर्थात सेना के जवानों के साथ स्तंत्रता दिवस मनाने के लिए। वे भारत का स्वर्ग कश्मीर की धरती पर जाने को उत्सुक थी।

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 3


‘‘चुप! खामोश।’’ अनन्या पूरी ताकत से चीखी। इतने में कक्षा का दरवाजा खुला और मेडम कमलेश भीतर प्रवेश करती हुई अपनी नाराजगी जताने लगी- ‘‘अनन्या मोनीटर होकर तुम्हारा इस तरह चीखना शोभा नहीं देता। जब अकेली इतना चिल्लाओगी तो क्लास को किस तरह चुप रखोगी? लगता है तुममें अच्छे मोनीटर के गुण नहीं...तुम ट्रूप कैसे संभालोगी? दरअसल तुमहारी पूरी क्लास भी इस काबिल नहीं कि उसे किसी आयोजन के लिए भेजा जा सके। तुम सबकी यही सजा है कि इस बार तुम्हें इस परेड से वंचित रखा जाय। सूची से चुने गये सब नाम काट दिए जाए।
मेडम....
अनन्या कुछ बोलने को हुई तो मेडम ने उसे झिड़क दिया। बहुत हो गया मैं कुछ नहीं सुनने वाली। एक खाली पिरीयड तुम नहीं संभाल सकती। मैंने अपनी आंखों से सब देख लिया है। मैं तो यही रिपोर्ट करूंगी। चलो लड़कियों अपनी काॅपी निकालो। आज हम 10 वीं प्रश्नावली हल करेंगे। सबसे पहले मैं सरल ब्याज का सवाल लिखाती हूं। सब लिखो। मेडम ने लिखवाना शुरू किया। अनन्या बुझे मन से सवाल लिखने लगी। अनन्या क्या पूरी कक्षा की लड़कियों के चेहरे बुझे हुए थे। जो कक्षा अभी मस्ती में डूबी हुई थी वहां का वातावरण बोझिल हो गया।
पिरीयड के खत्म होते ही दीप्ति ने अनन्या से माफी मांगी- ‘‘साॅरी अनन्या....’’
‘‘अब साॅरी कहने से क्या फायदा? हमारी क्लास का नाम तो कट ही गया ना....।’’ अनन्या की आंसू भरी आंखे यहीं बोल रही थी। दीप्ति अनन्या से लिपट गई। 
‘‘हमंे माफ कर दो अनन्या... कहते हुए लड़कियों ने अनन्या को घेर लिया। रूंआसी अनन्या के मुंह से केवल इतना ही फूटा- ‘‘हमें सजा तो मिल ही चुकी है। अब पछताने से क्या फायदा?

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 2



‘‘अरे ये क्या धक्का मुक्की हो रही है?’’ कोई कपड़े खींच रही थी तो कोई बाल नौंच रही थी। अनन्या उन्हें छुड़ाने की कोशिश करने लगी- ‘‘दीप्ति ये क्या तरीका है?’’
‘‘मैंने नहीं मारा धक्का... धक्का पीछे से आया था...वो पीछे बानो की बच्ची...तुझे तो अभी देखती हूं....’’. कहती हुई वह झपटने वाली थी कि दो तीन लड़कियों ने उसे पकड़ कर रोक लिया। लड़ो मत...लड़ो मत....चलो लड़ाई लड़ाई माफ करो, गांधीजी को याद करो।
‘‘उफ् तुम लोग तो किसी ट्रूप में जाने के काबिल हो नहीं। अभी मेडम से सबकी शिकायत करती हूं। कहती हुई मोनीटर ने पेन निकाल लिया और नाम लिखने लगी। लड़ती झगती लड़कियां लड़ना छोड़ अनन्या को घेर लिया।
‘‘ओ अनन्या क्या करती हो...प्लीज मेरा नाम मत लिखना...ट्रूप से मेरा नाम नहीं कटना चाहिये....
‘‘मेरा नाम तूने सबसे पहले लिख दिया।’’ दीप्ति चिल्लाई। ‘‘काटो अभी का अभी। नहीं तो....’’ दीप्ति ने दांत भींच लिये।
‘‘नहीं तो क्या? डराती है? जाओ सब पहले अपनी अपनी जगह बैठो। जो चुपचाप बैठ जायेगा उसका नाम थोड़ी देर में कट जायेगा।’’ अनन्या का कहा मान सब लड़कियां अपनी अपनी जगह बैठ गई। दीप्ति मुंह बना रही थी। उसकी ठोडी में सलमा का दांत गड़ा था। वह अभी भी अपनी दाढ़ी सहला रही थी। बोली- ‘‘शकीला, बानो और गुरमीत का नाम लिखो। सारे फसाद की जड़ यही है।’’
‘‘हमारा क्यों? सबसे पहले अपना नाम लिखवा।’’
‘‘चुप करो। मुझे क्या लिखना है और क्या नहीं ये मैं जानती हूं। कोई भी एक शब्द नहीं बोलेगा।’’ अनन्या के कहने पर दीप्ति ने मुंह बनाते हुए फुसफुसाया, ‘बड़ी आई मोनीटरनी! हूउं!
तभी कक्षा की एक लड़की ने चाॅक उठा कर पीछे बैठी लड़की पर मार दी। लड़की झुककर मार बचा गई। चाॅक दीवार से जा टकराई। पास बैठी लड़की ने चाॅक उठाई और उसी दिशा में जोर से फैंक मारी जहां से चाॅक आयी थी। ‘‘तुम अगाड़ी वाले पीछाड़ी वालो को क्यों मार रहे हो? लो अब तुम खाओ।’’ अब तो चाॅक से मारा मारी का खेल शुरू हो गया। लड़कियां एक दूसरे को चाॅक से मारने लगी। इस बीच अनन्या उठी और कक्षा से बाहर निकल गई। किसी एक ने कहा, ‘‘अनन्या मेडम के पास शिकायत करने गई है।’’
‘‘मेरा नाम तो नहीं लिखा था उसने? ..... तेरा नाम लिखते देखा था मैंने.....क्या अब मुझे दल में शामिल नहीं किया जायेगा?...अब सब चुपचाप बैठो।’’ कक्षा की लड़कियां फिर मौन होकर बैठ गई। दो मिनिट बाद अनन्या लौट आयी। खामोश बैठी लड़कियों से बोली- ‘‘परेड लीडर का नाम चुन लिया गया है।’’
‘‘कौन है?...बताओ तो जरा....’’ सभी फिर से चिल्ला उठी।
‘‘मुझे पता है पर मैं नहीं बताऊंगी। मेडम ही आकर बतायेगी। इतने में एक कागज का बना हवाई जहाज पीछे से उड़ता हुआ आया और अनन्या की टेबिल पर आ गिरा। उसने हवाई जहाज को उठाया। इस पर अनन्या का कार्टून बना हुआ था। बिखरे बालों के साथ बड़े बड़े दांत बाहर निकले हुए चेहरे के नीचे लिखा था कक्षा की मोनीटर- राक्षसनी। अनन्या ने पीछे घूमकर देखा। सब लड़कियां मुंह पर हाथ रखे मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। अनन्या को गुस्सा आ गया- ‘‘अब तो जरूरसे सबकी शिकायत करूंगी। ये हवाई जहाज भी मेडम को दिखाऊंगी।’’
‘‘मेडम को अपना ये कार्टून बताओगी अनन्या.....?’’
‘‘चुप! खामोश।’’ अनन्या पूरी ताकत से चीखी। इतने में कक्षा का दरवाजा खुला और मेडम कमलेश भीतर प्रवेश करती हुई अपनी नाराजगी जताने लगी-

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 1

‘‘प्लीज शान्त हो जाओ एक और अच्छी खबर है मेरे पास।’’
‘‘क्या.....? क्या....?’’
‘‘हमारी कक्षा को परेड प्रदर्शन के बाद गीत गाने का मौका मिलेगा। उसकी सभी को तैयारी करनी होगी।’’
‘‘अजी कमाल हो गया .... मोनीटरजी इस बार तो तूसी रिपोर्ट बड़ी जानदार है।’’ जसविन्दर जोर से चिल्लाई तो हरप्रीत ने मुंह में अंगुली डाल जोर से सीटी बजा दी। ‘‘कौन सा गीत है मोनीटरजी? हम भी तो सुने।’’
‘‘बताती हूं।’’ कहती हुई अनन्या क्लासरूम के मंच पर चढ़ गई। मेडम की खाली टेबुल कुर्सी के पास जाकर खड़ी हो गई ओर फिर कहने लगी- किस किस को याद है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा.....।’’
अनन्या के इतना कहने भर की देर थी। कई लड़किया हाथ उठाए मंच की ओर दौड़ पड़ी- हमें आता है.....हमें पूरा याद है....
एक एककर लड़कियों का पूरा झुंड कक्षा मंच पर पहुंच गया। सभी गाने लगी-
सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा, हमारा
हम बुलबुले है इसके ये गुलसिता हमारा...हमारा...
‘‘प्लीज लड़कियों इतना बेसुरा मत गाओ कि गीत ही शर्मा जाय।’’ अनन्या कान के पर्दे बंद करती हुई चीखी। पर उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था। पूरी कक्षा में गीत के शब्द बेसुरे होकर शोर पैदा करने लगे-
पर्वत वो सबसे ऊंचा.....गोदी में खेलती है जिसके हजारों नदिया....हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्ता हमारा...सारे जहां से अच्छा... शोर बढ़ने लगा तो अनन्या ने बढ़कर कक्षा के दरवाजे खिड़की बन्द करने लगी। ताकि शोर बाहर न जाय। उसका कक्षा को संभालना मुश्किल होता जा रहा था। लगभग दस मिनिट तक यही सब शोर शराबा चलता रहा। इसके बाद दीप्ति के पांव पर किसी का पैर लग गया। उई मां! दीप्ति चीख उठी- बदतमीज कहीं की....। उसने एक तमाचा शकीला के मुंह पर जड़ दिया। यह देख बानो ने दीप्ति को धक्का दे दिया। दीप्ति पीछे की लड़कियो से जा टकराई। किसी के सिर की ठोडी ठुकी तो किसी के होठ दांत में घुस गये।
‘‘अरे ये क्या धक्का मुक्की हो रही है?’’

कारगिल की घाटी : 15 अगस्त 2012







                       खाली पीरियड


‘‘ओऐं लड़कियों ऽ ऽ सब चुप हो जाओ....क्लास गल्र्स.....प्लीज.....शट योर माऊथ...’’कक्षा की मोनीटर अनन्या ने दरवाजे के भीतर घुसते हुए कहा। अनन्या की आवाज सुन खुसुर-पुसर करती, बतियाती, शोर करती सब लड़किया शान्त हो गई।
अनन्या अभी स्टाॅफरूम से लौटी थी। वह अध्यापिका का संदेश देने लगी-
‘‘सब सुनो, आज कमलेश मेडम क्लास नहीं लेगी.....स्टाॅफरूम में 15 अगस्त की तैयारी को लेकर मंत्रणा चल रही है। इस बार हमारे विद्यालय को स्टेडियम परेड के  दौरान अग्रिम पंक्ति में रहने का मौका मिला है। सबसे पहले हमारे स्कूल का ट्रूप होगा हमारे स्कूल का झंडा लिए....’’
हिप .... हिप... हुर्रे..... सभी लड़किया एक साथ उछल पड़ी।
‘‘सुनो सुनो ऽ’’ ताली बजाती मोनीटर ने मुंह पर अंगुली रखकर सबको चुप रहने का संकेत किया।
‘‘सब चुप हो जाओ......संभावना है कि परेड ट्रूप का कमांडर भी हमारे विद्यालय से चुना जाय शायद इसीलिए.......’’
‘‘क्या कोई लड़की बनेगी ट्रूप कमांडर.....हुर्रे....’’ सभी लड़किया एक साथ उछल पड़ी। ‘‘सुनो....सुनो...सुनो......’’ताली बजाती हुई मोनीटर ने मुंह पर अंगुली रखकर सबको चुप होने का संकेत किया। ‘‘सब चुप हो जाओ प्लीज...। परेड ट्रूप का कमांडर भी हमारे विद्यालय से चुना जाना तय है शायद इसीलिए.... ’’टेबिल थपथपाने की आवाज गूंजने लगी।
‘‘चयन के लिए सभी अध्यापिकाएं लड़कियों के नाम प्रस्तावित करके सूची बना रही है जो प्रधानाध्यापिकाजी को दी जायेगी। फिर वे किसी एक को चुनेगी।’’
‘‘वाह जी वाह! वाह....जी....वाह........कौन होगी वह मिस भाग्यशाली?.....हमारे स्कूल की ब्रांड एमबेसेडर?’’

बुधवार, 20 जुलाई 2011

घड़ी जब ग्यारह बजा रही थी। तो दलीचंद सामने था। नहाया हुआ। साफसुथरा। बालों में कंघी किये हुए दमकता हुआ मानो बरखा के बाद धूप खिली हो।
‘‘आ गये तुम!’’ मुस्कान से उसका स्वागत करते हुए मैंने कहां। प्रत्युक्तर में उसने गर्दन हिला दी।
‘‘पढ़ोगे?’’ मैं आश्वस्त होना चाहती थी। उसने दुबारा ‘हां’ में गर्दन हिला दी।
ठीक है मैंने मेज की ड्रावर खोलते हुए एक नई काॅपी पेन्सिल निकाली। शाम को ही उसके लिए खरीद कर लायी थी। काॅपी पेन्सिल उसकी ओर बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहती थी तभी ख्याल आया काॅपी पर इसका नाम तो लिख दूं।
‘‘तुम्हारा नाम लिख देती हूं।’’
नुकीली पेसिंल से मैंने उसका नाम सुन्दर अक्षरों में लिख दिया। अंग्रेजी लिपि में DLICHAND । वह देख रहा था। उसकी नजरे कौतुकी थी। मैंने महसूस किया कि उसे अच्छा लग रहा है। पहला पेज खोल उस पर कुछ आड़ी, तिरछी व सीधी रेखाएं खींचते हुए मैंने उसे समझाया -
‘‘ये देखो - ये सीधी, ये आड़ी और ये तिरछी रेखा है। इसे तुम भी बनाओ। यहां बैठकर।’’ पास की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा।
उसने काॅपी पेसिंल उठाई और उसे देखने लगा। मैंने उसे बैठने और रेखाएं खींचने के लिए फिर से कहा और अपने काम में लग गई।
मेरे सामने कागज फैले पड़े थे। गाढ़े पीले नीले रंगों को उठाया और अपने काम में मशगूल हो गई। मेरे हाथ से तेज मेरा दिमाग दौड़ रहा था। रंग आकृतियां बनाने लगे। धीरे धीरे एक पूरा आकार बनकर तैयार हो चुका था। मेरी एकाग्रता भंग हुई तो पास बैठे दलीचंद पर निगाह गई। वह मुझे व मेरे काम को देख रहा था अपलक। उसकी काॅपी में केवल एक सीधी रेखा खींची हुई थी।
‘‘अब तक केवल इतना ही किया...? देखो मैंने तो अपना पूरा एक काम कर लिया।’’ अपना काम उसे दिखाते हुए मैंने कहा।
‘ये क्या है?’ उसने रंगो की ओर इशारा करते हुए पूछा।
‘‘कलर्स है। तुम्हें चाहिये?’’
मैंने देख रही थी कि वह ललचायी नजर से उन्हें देख रहा था। मेरे पूछने पर उसने हां तो नहीं की पर उसके चेहरे पर खुशी का भाव था। मैंने उसे लाल रंग की पेंसिल थमाते हुए कहा - ‘‘लो इससे बनाओ सारी सीधी रेखा।’’
उसने पेंसिंल ले ली। अपनी पतली अंगुलियों के बीच पेंसिल फंसाये वह रेखा खींचने लगा। लगभग दो मिनिट से भी कम समय में उसने सारी सीधी रेखाएं खींच दी थी।
‘‘वाह! खूब। अब ये नीले रंग की पेंसिल लो। सारी आड़ी रेखाएं इससे बना दो।’’ रंग भरी पेसिंल पकड़ते हुए उसमें उत्साह समा गया और उसने फटाफट अपने काम को अंजाम दे दिया। अब बारी हरे रंग की तिरछी रेखाओं की थी। मुझे कुछ कहना नहीं पड़ा। दलीचंद के हाथ फुर्ती से बात पकड़ रहे थे। उसकी बुद्धी पर मुझे संतोष हुआ।
‘‘तुम शीघ्र ही अक्षर सीख लोगो। होशियार हो।’’ अगले पेज पर मैंने अंग्रेजी लिपि का ‘ए’ बनाकर उसे समझाया। ए को मैंने तीनो ही रंगों से डिजाईन किया। कुछ समय लगा पर दलीचंद की गाड़ी दौड़ पड़ी रंगों की डगर पर अक्षरों की सवारी लिए हुए।
यह एक अखबार का कार्यालय था जहां मैं विज्ञापन विभाग में काम करती थी। कई विज्ञापन हर रोज के आते थे। उन्हें सेट करना, डिजाईन करना, रंग,भाषा और लिपि देखने संबंधित कई कामों को गहराई से देखना परखना और जांच करना पड़ता था। पसंद नहीं आने पर नये लुक देना रोज पानी खोजने जैसा दुरूह कार्य काम है। परन्तु मेरी दिलचस्पी शुरू से ही सजृन और कला में रही है तो मैं यह काम बखूबी कर लेती थी।
यह मैं जिस समय की बात कर रही हूं उस समय कम्प्यूटर का इतना चलन नहीं था। ज्यादातर काम प्रिंटिग के पारम्परिक तरीको से होता था। अतः मशीनो के बजाय मानव श्रम से काम पूरे किये जाते थे। आज तो अत्याधुनिक छपाई मशीने आ गई है। डिजाईन का अधिकांश कार्य भी कम्प्यूटर के एक कमांड द्वारा सम्पन्न हो जाता है।
उस समय मुझ जैसे सृजन क्षमता वाले डिजाईनर कम ही हुआ करते थे। मैं अपने काम में भरपूर नये प्रयोग करती थी। यहां सभी मेरे काम से खुश थे। थोड़े ही दिनों में मैंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली। उस दिन दलीचंद जब मुझे पूछता हुआ कार्यालय आया था तो चपरासी ने उसे मुझ तक पहुंचा दिया था।
चपरासी चाय ले आया।
‘‘चाय पीओगे?’’ मैंने दलीचंद से पूछा। उसने जवाब नहीं दिया। जिसे मेंने हां समझा। उसके लिए भी चाय मंगवा ली। चाय खत्म होने के बाद मैंने पेंसिल उठाई और अगले पेज पर गोला बना दिया। गोला बनाकर काॅपी दलीचंद की ओर बढ़ा दी।
तभी सूचना आयी, ऋषभ सर बुला रहे है। वे यहां सब एडीटर अर्थात उपसंपादक है। अखबार का ले-आऊट वे ही तैयार करते है। मेरे द्वारा तैयार विज्ञापन के एप्रूव करने का जिम्मा भी उन्ही का था। मैंने संबंधित फाईल अपनी टेबिल से उठाई और सर के पास चली गई।
मैं जब वापस लौटी तो एक घंटा गुजर गया था। दलीचंद खिड़की पर खड़ा दौड़ती सड़क को निहार रहा था।
‘‘काम कर लिया?’’ मैंने उसकी काॅपी देखी। वह गोले से आधा पेज भर चुका था।
‘‘पूरा क्यों नहीं किया?’’ अभी तो तुम्हें हाफ सर्कल भी बनाना है।’’ वह मेरा मुंह देखने लगा।
‘‘कोई कठिनाई है?’’ बोला तो वह कुछ नहीं पर अनमना सा आकर फिर मेज के किनारे स्टूल पर बैठ गया। मेरे बताये अनुसार वह काम करता रहा। इस तरह उसने अंग्रेजी के तीन अक्षर ए बी और सी सीख लिया।
लंच का समय होने वाला था। इसे भी भूख लगी होगी। ‘‘टिफन लाये हो अपना?’’ वह हां में शर्माता हुआ मुस्कुराया।
‘‘खा लो।’’
मेरे कहने पर उसने अपने निकर की जेब में हाथ डाल कपड़े की पोटली निकाल ली। मैं देख रही थी-

बेसब्री से पोटली का खोलना।
लुकी बाटी का निकालना।
चटनी के साथ कौर का चबाना।
क्षुधा शान्ति भाव का पसरना।
लौटा भर पानी का पीना
तृप्त होकर डकार का लेना।
चेहरे पर सन्तुष्टि का तैरना।

‘‘अब तुम्हारी छुट्टी।