गुरुवार, 20 मार्च 2014

कारगिल की घाटी : 8

‘‘सुबह सवा छः बजे की ट्रेन है।’’ अनन्या के पिता ने कहा, ‘‘ट्रेन उदयपुर से ही उठती है इसीलिए निर्धारित समय पर रवाना होगी।’’
‘‘ हमें छः बजे रेलवे प्लेटफार्म पहुंचने का निर्देश मिला है।’’
‘‘हां, इसके लिए चार बजे उठना होगा तुम्हें। घड़ी में अलार्म भर कर सोना होगा।’’
‘‘मैं उठूंगी तब इसे उठा दूंगी। इसके साथ ले जाने का टिफिन का खाना बनाना ही है। मां की बात पूरी होते दादी ने घर में प्रवेश किया। उन्होंने ने बात को सुन लिया सो पूछने लगी, ‘‘कोई कहीं जा रहा है क्या?’’
‘‘हां मां, अनन्या स्कूल टूयर में जा रही है।’’
‘‘स्कूल टूयर में? कहां ले जा रहे है स्कूल वाले? कितनी लड़किया है? कौन साथ जा रहा है.....?’’ दादी ने एक के बाद एक प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
‘‘स्कूली बच्चे कारगिल के शहीद स्मारक जा रहे है। मां चिंता जैसी कोई बात नहीं है। मैं खुद स्कूल जाकर सब पता कर आया हूं। स्कूल वालों की सब जिम्मेदारी रहती है। कुल चार स्कूलों के बच्चे-टीचर जा रहे है। कोई हमारी अनन्या अकेली थोड़ी है।’’ पिता ने दादी को आश्वस्त करना चाहा। ‘‘ये बच्चे 15 अगस्त का दिन अर्थात हमारा स्वाधीनता दिवस कारगिल में तैनात जवानों के साथ मनायेंगे। शहर से कुल 12 जाने  वाले बच्चों में हमारी अनन्या ट्रूप लीडर के रूप में होगी। मां हमारे लिए यह गर्व की बात होगी।’’ वे एक ही सांस में सब कह गये।
‘‘कैसी बात करता है पप्पू? तेरा दिमाग तो ठीक है? बड़ी होती लड़की को इस तरह अेकेले...इत्ती दूर...’’
‘‘अकेल कहां दादी? स्कूल के अध्यापक-अध्यापिकाएं साथ रहेंगी।’’ बीच में ही बात काटकर लपक ली अनन्या ने।
‘‘कश्मीर में कितना आतंक है आतंकियों का? मुओ ने जीना मुहाल कर रखा है। कुछ मालूम है तुझे? अखबार पढ़े है तूने?’’
‘‘ये तुझसे किसने कह दिया मां? कभी कभार घटी घटनाओं के आधार से अनुमान लगा कर तुमने कुछ ज्यादा ही खौफ बिठा लिया है मन में। ऐसा कुछ नहीं है वहां। हर साल हजारों देशी-विदेशी पर्यटक कश्मीर घूमने जा रहे है। सीमा क्षेत्र होने से कुछ खतरे तो हमेशा ही बने रहते है। हमारी भारतीय सीमा की फौजे बड़ी चैकस है। हमंें अपने बच्चों को कमजोर नहीं करना चाहिए। इससे नई पीढ़ी में देशप्रेम व देश रक्षा की भावना विकसित होगी?’’ पिता की बात पर दादी कुछ बोल नहीं सकी। तो उन्होंने फिर कहना प्रारंभ किया-
‘‘जब वह खुद देखेंगे कि किस तरह से सेना हमारी सीमाओं सुरक्षा करती है। कितनी कठीन परिस्थिति में वे जीवन जीकर हम सब देशवासियों का जीवन सुगम बना देते है। बताओं मां? जीजाबाई, रानी कर्मावती की कहानियां तुम्हीं मुझे बचपन में सुनाया करती थी। क्या आज देश को ऐसी वीर स्त्रियों की आवश्यकता नहीं है?’’ वे कुछ क्षण रूके और दादी के चेहरे पर आये उतार-चढ़ाव को पढ़ने लगे।
‘‘सो तो ठीक कहता है पप्पू पर अभी इसकी उम्र ही क्या है?’’
‘‘चैदह-पन्द्रह बरस। मां झांसी की रानी ने भी तो इसी उम्र में अंग्रेजांे से लोहा लिया था। क्या वह स्त्री नहीं थी?’’
‘‘वो जमाना अलग था पप्पू, अब तो घोर कलियुग आ गया है।’’
‘‘नहीं पुराना-नया जमाना कभी अलग नहीं रहा। तुम ही तो मुझे सीख देती रही हो मां। बाऊजी की कितनी इच्छा थी मुझे सेना में भेजने की पर मैं नहीं जा सका। कारण तुम जानती हो। होम गार्ड बनकर सन्तुष्ट होना पड़ा। अब उनकी पोती सेना के जवानों से मिलेगी हमारे लिए यहीं फख्र क्या कम है?’’
दादी बिल्कुल निरूत्तर हो चुकी थी। पापा ने भी राहत की सांस खींची। मां पानी का गिलास भर लायी थी जिसे दादी ने ही सांस में पीकर खतम कर दिया। नीचे मूढ़े पर बैठते हुए उन्होंने अनन्या को संबोधित किया- ‘‘इधर आ मेरी शेरनी...’’ अनन्या दादी के पास पहुंची। यहां मेरे पास बैठ।’’ यह सुनते ही मम्मी पापा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
दादी अनन्या को समझाने लगी- एक लड़की को क्या क्या ध्यान रखना होता है खासतौर से जब वह घर से बाहर परायों के बीच होती है। किस बात से सर्तक और चैकन्ना रहना चाहिए। जरा कुछ भी खटका लगे तो तुरंत अपनी अध्यापिका को कहना चाहिये। सहपाठिनों का साथ नहीं छोड़ना है। जहां भी जाना हो मेडम से पूछकर जाना आदि बातों के बीच दादी अपने जमाने के किस्से सुनाती हुई उसे हंसाती रही और खुद भी साड़ी का पल्लू मुंह के आगे लगा हंसती रही।
साकेत भी लौट आया। वह आकर दादी के पास बैठ गया। जब उसे मालूम हुआ कि उसकी बहन कारगिल की ट्रूप पर जा रही है तो बहुत खुश हुआ। आशा के विपरीत अनन्या से लिपटकर कहने लगा- दीदी तुम्हारे बिना इतने दिन अकेला कैसे रहूंगा?’’
‘‘अकेला कहां? घर पर सब तो है।’’
‘‘कौन मुझे होमवर्क करने में मदद करेगा? इतने दिन में तो मैं गणित में पिछड़ ही जाऊंगा।’’
‘‘मैं ट्रूप से आकर सब करवा दूंगी।’’ इसके बाद दोनों भाई बहन में बाते होती रही। साकेत ने अपना नया पेन निकालकर दीदी को टूयर पर ले जाने के लिए दिया। उसने अपनी और भी चीजे दीदी को देनी चाही। मम्मी को आश्चर्य हा रहा थ हमेशा बहन से लड़ झगड़ की चीजे लेने वाला सकेत आज एकाएक इतना कैसे बदल गया? भाई बहन का निश्छल प्रेम देख मां का दिल भर आया।
‘‘तुम लो अब सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है।’’ पापा के कहने पर सब सोने चले गये। साकेत भी जल्दी उठा देने की बात कहकर सोया था। उधर मां कह रही थी कि परिस्थिति बदलते ही बच्चे अपने आप समझदार हो जाते है।
‘‘तभी तो मैं कहता हूं बच्चों को बाहर निकालना चाहिए।’’
‘‘तुमने तो मम्मीजी को ठीक से मना लिया। मुझे तो खटका लगा हुआ था।’’
‘‘उनकी कमजोर नस जो दबा दी मैंने सुनयना। आज मैं आर्मी में ऊंची रेंक पर होताा अगर मम्मी के बहकावे में न आता। बाऊजी ने तो बहुत चाहा था पर मां मुझे अपने आंचल से दूर न कर सकी। हमेशा अनजाने भय से ग्रस्त ही रही। 
‘‘वे मना कर देती तो अनन्या का तो मन ही मर जाता।’’
‘‘अनहोनी की आशंका होनी को टाल देती है। जिस कठीन समय की व्यर्थ चिन्ता करते है। कठीन समय जब आता है तो अपनी बु़िद्ध-विवेक, धैर्य व हौसले से सरलता से पार जा जाते है। यही कह रही है आज की घटना।’’
‘‘हां सही कहा आपने।’’ मां ने पिता के सीने में सिर दुबकाते हुए आंखे मूंद ली। लक्ष्मणसिंह यानि अनन्या के पिता आंखे बंद किए अपने अतीत में गोते लगाते हुए अनन्या के भविष्य के सपने बुनने लगे- ‘वह सेना के जवानो को सेल्यूट दे रही है। तिरंगा झंडा शान से आसमान में लहरा रहा है। तिरंगे के पीछे बर्फ से ढ़की हिमाालय की चोटी ‘टाईगर हिल’ को देख उनका सीना गर्व से फूल रही है। ऊंचे नीले आसमान में तिरती सफेद बादल की इक्की दुक्की टुकड़ी तैरती नजर आ रही है।’

शनिवार, 15 मार्च 2014

कारगिल की घाटी : 7

अनन्या ने अपने कारगिल टूयर में चयन की बात पिता को बतायी। सुनकर वह खुश भी हुए और उसके सिर को प्यार से सहलाया भी परन्तु घर में उन्होंने इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहा। आशा के विपरीत सारे हालात बन रहे थे। मां को मलेरिया हो गया।  वह रूआंसी हो आयी तो पापा ने उसका सिर सहला दिया। ‘‘स्कूल में टृयर के लिए रूपये जमा कराने है।’’ 

‘‘हां ले जाना एक दो दिन में दे दूंगा।’’ उसने पापा के कंधे पर अपना सिर टिका दिया। वे कुछ ना बोले केवल उसकी पीठ थपथपा दी। ‘यानि वो जायेगी।’ खुशी से वह भर उठी। दादी के बाहर जाने आने से अनन्या पर काम का भार बढ़ गया था। वह रसोई मे सब्जी झौंक रही थी कि पापा घर आ गये। ‘पापा स्कूल में ट्रूप के लिए कल ही जमा करानी है।’ वह कुछ कहती इससे पूर्व ही उन्होंने उसे रूपये दे दिये। जिसे उसने दूसरे दि ही जमा करा दिए। टूयर में जाने वाली चारों लड़कियों के रूपये जमा हो गये थे। बदले में उन्हें पूरा यात्रा का कार्यक्रम, समय व स्थान की सारणी, ठहराव की जगह साथ में ले जाने वाली चीजों की सूची आदि सूचना निर्देश पत्रवली दे दिए गए। अनन्या की आंखों उस समय खुशी से भर गई जब उसने पढ़ा कि उनकी कारगिल घाटी का सफर  रेलयात्रा से प्रारंभ होगा। वह कभी रेलगाड़ी में नहीं बैठी थी। यहां तक कि उसने कभी रेलवे प्लेटफार्म तक नहीं देखा। उसके उपने शहर में दो रेलवे प्लेटफार्म है- एक नया और एक पुराना। नये को न्यू सिटी स्टेशन और पुराने को राणा प्रताप रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता है। 10 अगस्त सुबह सवा छः बजे उदयपुर एक्सप्रेस 12991 ट्रेन से उनकी यात्रा प्रारंभ होगी। वे लोग करीबन 11.30 बजे तक अजमेर पहुंचेंगे। वहां से रेल बदलकर जम्मू के लिए वह 2.00 पूजा एक्सप्रेस नामक 12413 नम्बर ट्रेन में बैठेंगे। जो उन्हें दूसरे दिन सुबह 8.00 पर जम्मू में उतार देगी। प्रस्तावित रूपरेखा बताते हुए मेडम ने चारों लड़कियों को सफर के बारे में, 15 अगस्त के कारगिल शहीद स्मारक के बारे में कार्यक्रम संबंधित कई सूचनाओं को बताया। शहर के कुल चार विद्यालय से कुल 15-16 छात्र-छात्राएं सम्मिलित होंगी। प्रत्येक स्कूल से एक शिक्षक रहेगा। हमारे विद्यालय से कृपलानी सर जा रहे है। कृपलानी सर के अलावा दो महिला शिक्षिका भी रहेंगी। यह पूरा आयोजन शहर की ख्यातनाम बच्चो पर काम करने वाली संस्था ‘कल्पतरू’ करवा रही है। इसी कारण बहुत मामूली राशि जाने वाली प्रत्येक छात्रा को देनी तय की गई है।‘जरूरी साथ ले जाने वाले सामान की सूची अनुसार तैयारी करनी है।’ घर आकर अनन्या ने दोनों सूची मां को थमायी। हालत में अभी थोड़ा सुधार था। हालांकि मलेरिया की वजह से काफी कमजोर हो गई थी मां। ‘‘क्या है?’’ कहती हुई मां सूचनाएं एवं विवरण पढ़ने लगी। फिर बोली- ‘‘सबकुछ तो तैयार है। करना क्या है? जमा ले। वो नीला वाला बेग और काला सूटकेस ऊपर की ताक से उतार ले।’’ ‘यानि मां को जाने में कोई आपत्ति नहीं है।’ सोच में पड़ी अनन्या ने पूछ ही लिया- ‘‘ फिर तुम खामोश क्यों थी मां? इतने दिन कुछ बोली क्यों नहीं? मेरे जाने से तुम खुश नहीं हो?’’‘‘पगली है तू। सयानी हो रही है, धीरे धीरे सब समझ जाओगी। हर्ष अतिरेक से भी बनते काम बिगड़ जाते है या प्रसन्नता समय आने पर ही व्यक्त होनी चाहिए। मौन भी लाभ लिए होता है।’’9 अगस्त की शाम जब पापा घर आये तो उनके साथ लाल रंग का पहिए वाला सूटकेस थ जिसे वे स्ट्राॅलर कह रहे थे। पीछ पर लादने वाला नीला एयर बेग भी था। इसके साथ ही खाने के सामान के पैकेट, कुछ कपड़े वगैरह के साथ टार्च के सेल, छोटा टूथपेस्ट, कंघी, जैसी छोटी-छोटी ओर भी वस्तुएं देखकर वह खुशी के मारे उछल पड़ी। आगे बढ़कर वह पापा के कंधे पर झूल गई जिससे उनका संतुलन बिगड़ने लगा- ‘‘अरे..रे..क्या करती है अन्नु?’’ वह अपने पापा से लिपट गई- ‘‘आप बहुत अच्छे है पापा।’’‘‘हां जब सामान लाते है तब। वर्ना डांटते है जब.....बुरे। ऐसा ही है ना...’’ मां मुस्कुराने लगी। उनके हाथ में अनन्या के प्रेस किए हुउ कपड़ो की थड़ी थी। ‘‘लो अब कपड़े भी जमा दो इसके।’’ कहते हुए वे चादर, तौलिए, नेपकिन, रूमाल-मौजे जैसे जमा किए हुए और भी कपड़े ले आयी। उन्होंने सारा सामान पहले से ही निकाल रखा था। बाकी बचा सामान पापा मम्मी की लिस्ट अनुसार ले ही आये थे। ‘‘ये कुछ दवाईयां व फस्र्टएड का सामान का डिब्बा भी रखा है।’’ अनन्या को आश्चर्य हो रहा था। बिमार होते हएु मां ने ये गुपचुप तैयारी कब पूरी कर ली थी। साकेत और दादी दोनों घर से बाहर थे। दादी पड़ौस के मृत्यु वाले घर में गुरूड़ पुराण सुनने गई हुई थी और साकेत सहपाठी के यहो पढ़ने। मां ने सारा लगेज जम जाने के बाद पलंग के नीचे रखवा दिया। अब तक दादी व साकेत दोनों ही उसके जाने की बात से अनभिज्ञ थे।‘‘सुबह सवा छः बजे की ट्रेन है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कारगिल की घाटी : 6

रेल यात्रा की खुशी


कक्षा 9 बी की छात्राएं इस गीत को उतार कर याद कर लें। दो दिन बाद समूह गीत की तैयारी शुरू कराई जानी है। यह आदेश पढ़कर 9 बी की छात्राएं लिखने के लिए धकियाने लगी। कुछ तेज तर्राट लड़किया झुंड में आगे घुस गई। उनमें मिताली भी थी। मिताली ने सूचना पट्ट पर अनन्या का कारगिल जाने वाले ट्रूप में लिखा देखा तो वह भीड़ से बचती पीछे की ओर सरकने लग़ी। 
कुछ देर बाद भीड़ कम छंट गईतो अनन्या आगे बढ़ी। सूचना पट्ट साफ दिखाई दे रहा था। अपना नाम सूचनापट्ट पर देखते ही अनन्या कूद पड़ी। कारगिल टूयर में जाने वालो में जोगेश्वरी, देवयानी और सानिया के नाम भी थे। ये तीनों अनन्या की कक्षा की नहीं थी। जोगेश्वरी 10 ए और सानिया 10 बी की छात्रा थी। देवयानी कौनसी क्लास की है, अभी उसे यह नहीं मालूम। कश्मीर जाने के लिए उसका मन उत्साह से भर गया। कश्मीर भारत का स्वर्ग है अब तक उसने यही पढ़ा-सुना था। वह तो रेलगाड़ी में भी पहली बार ही बेठेगी। कभी कभार उसने बस की यात्रा तो की है पर रेल का सफर भी पहली बार ही करेगी। छुक..छुक..छुक...रेल का शोर उसके कानों में उभरने लगा। लड़किया उसे बधाई देने लगी। इतने में एक लम्बी पतली लडत्रकी उसके सामने यह पूछती हुई आ खड़ी हुई- ‘‘तुम्हीं अनन्या हो?’’
‘हां’ अनन्या ने हां में अपनी गर्दन हिलाई।
‘‘मैं देवयानी हूं...कारगिल ट्रूप में मेरा नाम भी है और तुम्हारा भी....यानि हम साथ जा रहे है।’’
‘‘अजी ये तो अच्छी बात है। तुम कौनसी कक्षा की हो?’’
‘‘मैं आठवी सी की छात्रा हूं।’’
‘‘पहले तो कीज्ञी देखा नहीं तुम्हें स्कूल में? कहां रहती हो?’’
‘‘हां मेरा नया एडमिशन है। अभी एक डेढ़ महीना पहले ही भर्ती हुई है। मैं फतहपुरा सर्किल पर रहती हूं। अपने नानी के साथ। डाॅ. आप्टे का नाम तुमने सुना हो शायद, शहर के बड़े नेत्र निशेषज्ञ है और तुम कहां रहती हो?’’ 
‘‘मैं पुराने शहर में मंडी में रहती हूं। मेरे पिता पुलिस लाईंस में होम गार्ड है और मेरी मां बाल ज्ञान मंदिर में शिक्षिका.... और तुम्हारे माता पिता? तुमने उनके बारे में तो बताया नहीं? क्या तुम जोगेश्वरी व सानिया को जानती हो? उनका नाम भी हमारे इस ग्रुप है।’’
‘‘नहीं नहीं मैं किसी को नहीं जानती। दरअसल इस स्कूल में मैं कुछ महीने पहले ही तो पढ़ने आयी हूं। मेरे माता पिता विदेश में नौकरी करते है। अभी आॅस्ट्रेलिया में है इससे पहले हम सब दुबई में थे।’’ इतने में सड़क पर कार का होर्न बजा। ‘‘अच्छाा मैं चलती हूं... मुझे लेने गाड़ी आ गई है।’’ बाॅय में हाथ हिलाती देवयानी स्कूल के मुख्य  द्वार की ओर बढ़ गई। अनन्या देवयानी की बात सुनकर कुछ सोचने लगी। मिताली ने आकर उसके कंधे पकड़ कर झकझोरा- ‘‘क्या आज घर नहीं चलना? यहां नोटिस बोर्ड पर ही चिपके रहना है क्या...?
‘चलो चलते है’ के अंदाज में अनन्या ने हाथ हिलाया ओर वे स्कूल के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गई। वे पैदल ही स्कूल से घर और घर से स्कूल आती जाती थी। स्कूल घर के बीच यही कोई आधा पौन किलोमीटर की दूरी थी जिसे वे लोग गलियों में से शार्टकट के रास्ते 15-20 मिनिट में पूरा कर लेती थी।
कई बार अनन्या ने पापा से साईकिल दिलाने की बात कही पर वे उसे अगली कक्षा में दिला देने की बात कहकर पुचकार लेते। इस कारण वह ज्यादा जिद नहीं कर पाती। पिछले साल साकेत ने साईकिल मांगी तो इस साल उसे मिल गई। मम्मी का कहना है कि साकेत का स्कूल दूर है तुम्हारा तो पास ही है। तुम्हें साईकिल की क्या जरूरत? अनन्या सोचती इसमें जरूरत की क्या बात, उसका बहुत मन करता है साईकिल चलाने का तो मम्मी कहती- खरीद भी लेंगे तो रखेंगे कहां? इस मकान में पहले से ही जगह की तंगी है। वह कहती घर बदल लो। नया ले लो। उसके इस सुझाव पर मां हंस पड़ती और दादी कहती घर खरीदने जितने पैसे भी तो चाहिए। उफ! मैं कुछ नहीं जानती बस मुझे साईकिल चलानी है। वह फर्राटे से उड़ना चाहती है ओर लोगों की तरह।
‘‘किस सोच में डूबी हो अनन्या? तुम तो बहुत किसम्मत वाली निकली। पता है तुम्हारा नाम बोर्ड तक कैसे पहुंचा?’’
‘नहीं’ कुछ नहीं बोलकर उसने गर्दन हिलायी।
- कमलेश मेडम ने दिया है तुम्हारा नाम। सूची में कुल दस नाम थे पर चुनना केवल चार को ही था। बाकी छः नाम कट गये। तुम्हारा रह गया।
- तुम्हें कैसे मालूम?
- हमारी कक्षा की लड़कियां बता रही थी। स्टाॅफ रूम में कमलेश मेडम कुपलानी सर के सामने तुम्हारा पक्ष लेते हुए कह रही थी, ‘अधिक पैसे वाले घर से नहीं है लड़की पर है कुशाग्र और अनुशासित। उसकी ऊंची कदकाठी भी ट्रूप के लायक है। उसे मौका अवश्य दीजियेगा।’
- सच, ऐसा कहा उन्होंने।’ तभी उसे दादी की उसे लेकर कही फब्ती याद हो आई। ‘ऊंची ऊंटनी जैसी हो गई है।’ तब पापा ने गर्व से कहा था, ‘होगी क्यों नहीं मां, अपनी अन्नू अच्छी खिलाड़ी जो है। जो बच्चे खेलते है वो भी एक तरह का व्यायाम ही है। खेलकूद से न केवल हष्ट-पुष्ट रहते बल्कि शरीर भी सुगठित व सुडौल बनता है। फिर तुम अपनी लाडली को रोज मक्खन रोटी जो खिलाती हो।’ पापा की बात पर दादी मुस्कुराती बोली- ‘लड़के लड़की का भेद नहीं करती मैं।’ ‘पर कभी कभी टोंक ही देती हो उसके जोर से हंसने पर.... बोलने पर... उठबैठ पर....’ ‘देख पप्पू तू उसकी गलत हिमायत ना भर। मैं कोई उसकी दुश्मन नहीं हूं। दादी हूं उसकी। बड़े जतन से पालपोस कर बड़ा किया है। आजकल जमाने की हवा बहुत खराब है जो हर समय मेरे को चिन्ता लगी रहती है। इसलिए जरा बरज लेती हूं। रोज अखबारों में किस्से भरे रहते है......’फिर तो दादी और पापा में बहस होने लगी। 
अनन्या को चुपचाप चलते देख मिताली ने पूछा- ‘‘क्या सोच रही हो अनन्या?’’
‘‘सोचती हूं मेरा ऊंटनी होना बेकार नहीं गया। ट्रूप के लिए काम आ गया।’’ और फुस्स करके वह हंस पड़ी। कहने लगी-
‘‘घर पर मां तो अभी आई नहीं होगी और पापा तो वैसे ही देर से आते है। साकेत को कुछ कहने बताने का कोई मतलब नहीं। ऐसे ही बखेड़ा करेगा। चिल्ला चिल्लाकर रोयेगा सो अलग... और दादी को बताना यानि उफ! किसी काम के लिए इन्कार करवाना। दादी तो वैसे ही इतनी डरपोक है कि उसे दूध की डेयरी तक अकेला जाने से मना करती है। कहती है साकेत को ले जा। जैसे वह कोई गुड़ की डली है जो उठा लेगा और मुंह में रख लेगा गप्प।’’
अनन्या घर पहुंची तो देखा मां आ चुकी है और बिस्तर पर सो रही है। उन्होंने पूरे बदन को मोटी चादर से ढ़क रखा है। वह पास गई तो पता चला कि मां का बदन गर्म है। ‘‘मां तुम्हें तो बुखार आ रहा है?’’
 ‘‘हां, हाथ पैर और सिर दर्द कर रहा है।’’ वह सोच में पड़ गई। क्या करें? ‘‘चाय बनाऊं? दादी कहां गई मां?’’ इधर उधर देख उसने पूछा।
‘‘पड़ौस में मृत्यु हो गई है। दादी वहां गई है। मुझे भी जाना है पर तबीयत साथ नहीं दे रही है। पूरा घर बिखर रहा और शाम का खाना बनाना है। तुम दोनांे को अभी भूख लगेगी।’’ उन्होंने उठने की कोशिश करते हुए कहा।
‘‘सोई रहो मां। अब मैं आ गई हूं।’’ अनन्या ने मां को तस्सली दी। ‘‘मेरे पास स्कूटी होती तो तुम्हें अभी अस्पताल लेकर चली जाती। चलो मां ओटो रिक्शा में ले चलती हूं।
‘‘नहीं मैंने गोली ले ली है। अभी ठीक हो जाऊंगी।’’

कारगिल की घाटी : 5


इकबाल के लिखे इस प्रसिद्ध गीत को नोटिस बोर्ड पर लगा दिया गया। 
गीत


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा

हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसिता हमारा। 


घुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन मे

समझो वही हमे भी दिल है जहाँ हमारा ।


परबत वो सब से ऊंचा हमसाया आसमाँ का

वो संतरी हमारा वो पासबा हमारा ।
गोदी मे खेलती है इसकी हजारो नदिया
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा ।


ए अब रौद गंगा वो दिन है याद तुझको

उतर तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ।
मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा ।।

युनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशान हमारा ।
कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी
सदियो रहा है दुश्मन दौर-ए-जमान हमारा ।।

इक्बाल कोइ मेहरम अपना नही जहाँ मे
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा ।।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

कारगिल की घाटी : 4

‘‘हमंे माफ कर दो अनन्या... कहते हुए लड़कियों ने अनन्या को घेर लिया। रूंआसी अनन्या के मुंह से केवल इतना ही फूटा- ‘‘हमें सजा तो मिल ही चुकी है। अब पछताने से क्या फायदा? कल प्रार्थना के बाद नामों की घोषणा होने वाली है.....ऐन मौके पर चयन के एक दिन पहले ही हमारी कक्षा का नाम काट जाता है...... तो?


मध्यान्तर की छुट्टी में सभी लड़किया अटकले लगाने लगी- ‘‘परेड दल के लिए किस किस का नाम चुना जा सकता है....और दल का लीडर कौन कौन हो सकता है?’’

लड़कियों की इस बात पर दीप्ति बोल उठी- ‘‘हमारी ट्रूप लीडर तो अनन्या जैसी होनी चाहिए।’’
‘‘हां, बिल्कुल सही है।’’ 
‘‘हम सबकी भी यही राय है’’ दूसरे सेक्शन की लड़कियों ने भी स्वर मिलाया। सब कहने लगी- ‘‘अनन्या में लीडर के सब गुण है। समझदार होने के साथ सबको साथ लेकर चलना उसे आता है। वह सबसे प्रेम करती है किसी का बुरा नहीं सोचती है......बातूनी लड़कियों की बातें की गाड़ी पटरी पर पटरी बदलती दौड़ी जा रही थी अगर छृट्टी की घंटी न बजी होती तो वे बहुत कुछ बतियाती रहती। 
अपना अपना बैग-बस्ता-टिफन उठाए सब घर जाने को आतुर हुई सबकुछ भूलकर गेट की ओर लपक कर दौड़ पड़ी।
गेट से निकल कर चलती-दौड़ती लड़कियों का रेला ऐसा लग रहा था मानो कैद से छूटकर कैदी भागे जा रहे हो सरपट। सुबह ठीक नौ बजते ही यही लड़कियां घंटी की आवाज पर स्कूल प्रागंण में आ जुटती है- कतारबद्ध होकर अपनी अपनी कक्षाओं की पंक्ति में अलग-अलग लाईन में। छोटी से बड़ी लम्बाई के क्रम में जमी हुई अनुशासन से बंधी हुई सावधान की मुद्रा में प्रार्थना की मुद्रा लिए आंखे बंद कर तल्लीन लड़कियां।  अन्न्या अपनी कक्षा लाईन में सबसे पीछे खड़ी हुई लम्बी लड़की थी। उसकी लम्बे कद के साथ लम्बे बाल, चेहरे पर लिपटी मधुर मुस्कान उसे सौम्य बनाती थी।
दूसरी घंटी बजते ही प्रर्थना प्रारंभ हुई। फिर इसके बाद ताजा समाचारों का वाचन हुआ। फिर पी.टी.आई. मेडम ने अमृत वचन सुनाये। प्रार्थना सभा के विधिवत रूप से पूरा होने के बाद प्रधानाचार्याजी माईक के सामने आकर खड़ी हुई। वे सब छात्रों को संबोधित करके कहने लगी-
‘‘प्यारे बच्चों, तुम्हें यह जानकर ख्ुशी होगी और मुझ व हमारे स्टाफ को भी गर्व होगा कि इस बार 15 अगस्त पर स्टेडियम में होने वाली परेड में हमारे विद्यालय का ट्रूप सबसे आगे होगा....और ट्रूप के आगे होगा हमारे विद्यालय का झंडा थामें ट्रूप लीडर। ट्रूप लीडर उसे चुना जायेगा जो परेड प्रशिक्षण के दौरान अच्दा प्रदर्शन करेगा। इसका निर्णय आपकी पी.टी.आई. मेडम करेगी।
इसके अलावा हमारे विद्यालय की एक छात्रा को स्टेडिय परेड टीम की कमांडर बनाया जायेगा। जिसका चयन सभी स्कूल से जुड़ी चयन समिति करेगी। इस बार स्टेडियम में समूह गान के लिए जो गाना चुना गया है जैसा सभी को मालूम भी है ‘‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा’’ इकबाल का लिख मशहूर यह गीत नोटिस बोर्ड पर पूरा लिखा हुआ है। उसे लिखकर सही तरह से याद कर लें। ताकि कोई त्रुटि ना रहे।
इन सबमें एक खास और अहम बात जो मैं अब बताने जा रही हूं वह है हमारे  शहर के चार विद्यालयों से छात्र-छात्राओं का चुना हुआ एक प्रतिनिधि मंडल स्वाधीनता दिवस पर कारगील की घाटी में शहीद स्मारक पर देश की सेना के जवानों के साथ मनायेगा। प्रधानाचार्याजी की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि लड़कियों में हर्ष की लहर दौड़ गई। तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। कुछ क्षण बाद बड़ी मेडम ने सबको शांत होने का इशारा किया। कुल चार छात्रों को ले जाना तय है। इच्छुक छात्राएं अपना नाम कक्षा टीचर को लिखवा दें। लिखे हुए नामों से ही चयन किया जायेगा। इस दल के साथ स्कूल की अध्यापिका भी रहेगी। बारह दिन के इस टूयर में जम्मू कशमीर की सैर भी करायी जायेगी। यह टूयर 10 अगस्त को उदयपुर से प्रातः सवा छः बजे रेलगाड़ी की यात्रा से प्रारंभ होगा। टूयर की विस्तृत जानकारी सूचना पट्ट पर लगा दी जायेगी। 
इसके  साथ बड़ी मेडम ने अपनी बात को खतम करते हुए आगे निर्देश दिया- ‘‘सभी अपनी अपनी कक्षाओं की ओर प्रस्थान करें।’’
पहले पाश्र्व की पंक्ति बढ़नी शुरू हुई। इसके अंतिम छोर से साथ वाली दूसरी पंक्ति जुड़ती गई। स्व-अनुशासन व स्व-नियंत्रण का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा कि बिना शोर किए एक जैसी यूनीफोर्म पहने कतारबद्ध लड़किया आगे बढ़ती अपनी कक्षाओं के निर्धारित स्थानों पर पहुंच गई। कुछ ही देर बाद शिक्षिकाओं के मुपीछे मुड़ते ही ये नियंत्रण गुम हो गया। लड़किया कक्षा में पहले भीतर घुसने के लिए एक दूसरे को धकियाती हुई शोर मचाने लगी।
अनन्या के साथ दीप्ति ने अपना नाम लिखवाया था। कारगित की घाटी में 15 अगस्त अर्थात सेना के जवानों के साथ स्तंत्रता दिवस मनाने के लिए। वे भारत का स्वर्ग कश्मीर की धरती पर जाने को उत्सुक थी।

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 3


‘‘चुप! खामोश।’’ अनन्या पूरी ताकत से चीखी। इतने में कक्षा का दरवाजा खुला और मेडम कमलेश भीतर प्रवेश करती हुई अपनी नाराजगी जताने लगी- ‘‘अनन्या मोनीटर होकर तुम्हारा इस तरह चीखना शोभा नहीं देता। जब अकेली इतना चिल्लाओगी तो क्लास को किस तरह चुप रखोगी? लगता है तुममें अच्छे मोनीटर के गुण नहीं...तुम ट्रूप कैसे संभालोगी? दरअसल तुमहारी पूरी क्लास भी इस काबिल नहीं कि उसे किसी आयोजन के लिए भेजा जा सके। तुम सबकी यही सजा है कि इस बार तुम्हें इस परेड से वंचित रखा जाय। सूची से चुने गये सब नाम काट दिए जाए।
मेडम....
अनन्या कुछ बोलने को हुई तो मेडम ने उसे झिड़क दिया। बहुत हो गया मैं कुछ नहीं सुनने वाली। एक खाली पिरीयड तुम नहीं संभाल सकती। मैंने अपनी आंखों से सब देख लिया है। मैं तो यही रिपोर्ट करूंगी। चलो लड़कियों अपनी काॅपी निकालो। आज हम 10 वीं प्रश्नावली हल करेंगे। सबसे पहले मैं सरल ब्याज का सवाल लिखाती हूं। सब लिखो। मेडम ने लिखवाना शुरू किया। अनन्या बुझे मन से सवाल लिखने लगी। अनन्या क्या पूरी कक्षा की लड़कियों के चेहरे बुझे हुए थे। जो कक्षा अभी मस्ती में डूबी हुई थी वहां का वातावरण बोझिल हो गया।
पिरीयड के खत्म होते ही दीप्ति ने अनन्या से माफी मांगी- ‘‘साॅरी अनन्या....’’
‘‘अब साॅरी कहने से क्या फायदा? हमारी क्लास का नाम तो कट ही गया ना....।’’ अनन्या की आंसू भरी आंखे यहीं बोल रही थी। दीप्ति अनन्या से लिपट गई। 
‘‘हमंे माफ कर दो अनन्या... कहते हुए लड़कियों ने अनन्या को घेर लिया। रूंआसी अनन्या के मुंह से केवल इतना ही फूटा- ‘‘हमें सजा तो मिल ही चुकी है। अब पछताने से क्या फायदा?

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 2



‘‘अरे ये क्या धक्का मुक्की हो रही है?’’ कोई कपड़े खींच रही थी तो कोई बाल नौंच रही थी। अनन्या उन्हें छुड़ाने की कोशिश करने लगी- ‘‘दीप्ति ये क्या तरीका है?’’
‘‘मैंने नहीं मारा धक्का... धक्का पीछे से आया था...वो पीछे बानो की बच्ची...तुझे तो अभी देखती हूं....’’. कहती हुई वह झपटने वाली थी कि दो तीन लड़कियों ने उसे पकड़ कर रोक लिया। लड़ो मत...लड़ो मत....चलो लड़ाई लड़ाई माफ करो, गांधीजी को याद करो।
‘‘उफ् तुम लोग तो किसी ट्रूप में जाने के काबिल हो नहीं। अभी मेडम से सबकी शिकायत करती हूं। कहती हुई मोनीटर ने पेन निकाल लिया और नाम लिखने लगी। लड़ती झगती लड़कियां लड़ना छोड़ अनन्या को घेर लिया।
‘‘ओ अनन्या क्या करती हो...प्लीज मेरा नाम मत लिखना...ट्रूप से मेरा नाम नहीं कटना चाहिये....
‘‘मेरा नाम तूने सबसे पहले लिख दिया।’’ दीप्ति चिल्लाई। ‘‘काटो अभी का अभी। नहीं तो....’’ दीप्ति ने दांत भींच लिये।
‘‘नहीं तो क्या? डराती है? जाओ सब पहले अपनी अपनी जगह बैठो। जो चुपचाप बैठ जायेगा उसका नाम थोड़ी देर में कट जायेगा।’’ अनन्या का कहा मान सब लड़कियां अपनी अपनी जगह बैठ गई। दीप्ति मुंह बना रही थी। उसकी ठोडी में सलमा का दांत गड़ा था। वह अभी भी अपनी दाढ़ी सहला रही थी। बोली- ‘‘शकीला, बानो और गुरमीत का नाम लिखो। सारे फसाद की जड़ यही है।’’
‘‘हमारा क्यों? सबसे पहले अपना नाम लिखवा।’’
‘‘चुप करो। मुझे क्या लिखना है और क्या नहीं ये मैं जानती हूं। कोई भी एक शब्द नहीं बोलेगा।’’ अनन्या के कहने पर दीप्ति ने मुंह बनाते हुए फुसफुसाया, ‘बड़ी आई मोनीटरनी! हूउं!
तभी कक्षा की एक लड़की ने चाॅक उठा कर पीछे बैठी लड़की पर मार दी। लड़की झुककर मार बचा गई। चाॅक दीवार से जा टकराई। पास बैठी लड़की ने चाॅक उठाई और उसी दिशा में जोर से फैंक मारी जहां से चाॅक आयी थी। ‘‘तुम अगाड़ी वाले पीछाड़ी वालो को क्यों मार रहे हो? लो अब तुम खाओ।’’ अब तो चाॅक से मारा मारी का खेल शुरू हो गया। लड़कियां एक दूसरे को चाॅक से मारने लगी। इस बीच अनन्या उठी और कक्षा से बाहर निकल गई। किसी एक ने कहा, ‘‘अनन्या मेडम के पास शिकायत करने गई है।’’
‘‘मेरा नाम तो नहीं लिखा था उसने? ..... तेरा नाम लिखते देखा था मैंने.....क्या अब मुझे दल में शामिल नहीं किया जायेगा?...अब सब चुपचाप बैठो।’’ कक्षा की लड़कियां फिर मौन होकर बैठ गई। दो मिनिट बाद अनन्या लौट आयी। खामोश बैठी लड़कियों से बोली- ‘‘परेड लीडर का नाम चुन लिया गया है।’’
‘‘कौन है?...बताओ तो जरा....’’ सभी फिर से चिल्ला उठी।
‘‘मुझे पता है पर मैं नहीं बताऊंगी। मेडम ही आकर बतायेगी। इतने में एक कागज का बना हवाई जहाज पीछे से उड़ता हुआ आया और अनन्या की टेबिल पर आ गिरा। उसने हवाई जहाज को उठाया। इस पर अनन्या का कार्टून बना हुआ था। बिखरे बालों के साथ बड़े बड़े दांत बाहर निकले हुए चेहरे के नीचे लिखा था कक्षा की मोनीटर- राक्षसनी। अनन्या ने पीछे घूमकर देखा। सब लड़कियां मुंह पर हाथ रखे मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। अनन्या को गुस्सा आ गया- ‘‘अब तो जरूरसे सबकी शिकायत करूंगी। ये हवाई जहाज भी मेडम को दिखाऊंगी।’’
‘‘मेडम को अपना ये कार्टून बताओगी अनन्या.....?’’
‘‘चुप! खामोश।’’ अनन्या पूरी ताकत से चीखी। इतने में कक्षा का दरवाजा खुला और मेडम कमलेश भीतर प्रवेश करती हुई अपनी नाराजगी जताने लगी-

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 1

‘‘प्लीज शान्त हो जाओ एक और अच्छी खबर है मेरे पास।’’
‘‘क्या.....? क्या....?’’
‘‘हमारी कक्षा को परेड प्रदर्शन के बाद गीत गाने का मौका मिलेगा। उसकी सभी को तैयारी करनी होगी।’’
‘‘अजी कमाल हो गया .... मोनीटरजी इस बार तो तूसी रिपोर्ट बड़ी जानदार है।’’ जसविन्दर जोर से चिल्लाई तो हरप्रीत ने मुंह में अंगुली डाल जोर से सीटी बजा दी। ‘‘कौन सा गीत है मोनीटरजी? हम भी तो सुने।’’
‘‘बताती हूं।’’ कहती हुई अनन्या क्लासरूम के मंच पर चढ़ गई। मेडम की खाली टेबुल कुर्सी के पास जाकर खड़ी हो गई ओर फिर कहने लगी- किस किस को याद है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा.....।’’
अनन्या के इतना कहने भर की देर थी। कई लड़किया हाथ उठाए मंच की ओर दौड़ पड़ी- हमें आता है.....हमें पूरा याद है....
एक एककर लड़कियों का पूरा झुंड कक्षा मंच पर पहुंच गया। सभी गाने लगी-
सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा, हमारा
हम बुलबुले है इसके ये गुलसिता हमारा...हमारा...
‘‘प्लीज लड़कियों इतना बेसुरा मत गाओ कि गीत ही शर्मा जाय।’’ अनन्या कान के पर्दे बंद करती हुई चीखी। पर उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था। पूरी कक्षा में गीत के शब्द बेसुरे होकर शोर पैदा करने लगे-
पर्वत वो सबसे ऊंचा.....गोदी में खेलती है जिसके हजारों नदिया....हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्ता हमारा...सारे जहां से अच्छा... शोर बढ़ने लगा तो अनन्या ने बढ़कर कक्षा के दरवाजे खिड़की बन्द करने लगी। ताकि शोर बाहर न जाय। उसका कक्षा को संभालना मुश्किल होता जा रहा था। लगभग दस मिनिट तक यही सब शोर शराबा चलता रहा। इसके बाद दीप्ति के पांव पर किसी का पैर लग गया। उई मां! दीप्ति चीख उठी- बदतमीज कहीं की....। उसने एक तमाचा शकीला के मुंह पर जड़ दिया। यह देख बानो ने दीप्ति को धक्का दे दिया। दीप्ति पीछे की लड़कियो से जा टकराई। किसी के सिर की ठोडी ठुकी तो किसी के होठ दांत में घुस गये।
‘‘अरे ये क्या धक्का मुक्की हो रही है?’’

कारगिल की घाटी : 15 अगस्त 2012







                       खाली पीरियड


‘‘ओऐं लड़कियों ऽ ऽ सब चुप हो जाओ....क्लास गल्र्स.....प्लीज.....शट योर माऊथ...’’कक्षा की मोनीटर अनन्या ने दरवाजे के भीतर घुसते हुए कहा। अनन्या की आवाज सुन खुसुर-पुसर करती, बतियाती, शोर करती सब लड़किया शान्त हो गई।
अनन्या अभी स्टाॅफरूम से लौटी थी। वह अध्यापिका का संदेश देने लगी-
‘‘सब सुनो, आज कमलेश मेडम क्लास नहीं लेगी.....स्टाॅफरूम में 15 अगस्त की तैयारी को लेकर मंत्रणा चल रही है। इस बार हमारे विद्यालय को स्टेडियम परेड के  दौरान अग्रिम पंक्ति में रहने का मौका मिला है। सबसे पहले हमारे स्कूल का ट्रूप होगा हमारे स्कूल का झंडा लिए....’’
हिप .... हिप... हुर्रे..... सभी लड़किया एक साथ उछल पड़ी।
‘‘सुनो सुनो ऽ’’ ताली बजाती मोनीटर ने मुंह पर अंगुली रखकर सबको चुप रहने का संकेत किया।
‘‘सब चुप हो जाओ......संभावना है कि परेड ट्रूप का कमांडर भी हमारे विद्यालय से चुना जाय शायद इसीलिए.......’’
‘‘क्या कोई लड़की बनेगी ट्रूप कमांडर.....हुर्रे....’’ सभी लड़किया एक साथ उछल पड़ी। ‘‘सुनो....सुनो...सुनो......’’ताली बजाती हुई मोनीटर ने मुंह पर अंगुली रखकर सबको चुप होने का संकेत किया। ‘‘सब चुप हो जाओ प्लीज...। परेड ट्रूप का कमांडर भी हमारे विद्यालय से चुना जाना तय है शायद इसीलिए.... ’’टेबिल थपथपाने की आवाज गूंजने लगी।
‘‘चयन के लिए सभी अध्यापिकाएं लड़कियों के नाम प्रस्तावित करके सूची बना रही है जो प्रधानाध्यापिकाजी को दी जायेगी। फिर वे किसी एक को चुनेगी।’’
‘‘वाह जी वाह! वाह....जी....वाह........कौन होगी वह मिस भाग्यशाली?.....हमारे स्कूल की ब्रांड एमबेसेडर?’’

बुधवार, 20 जुलाई 2011

घड़ी जब ग्यारह बजा रही थी। तो दलीचंद सामने था। नहाया हुआ। साफसुथरा। बालों में कंघी किये हुए दमकता हुआ मानो बरखा के बाद धूप खिली हो।
‘‘आ गये तुम!’’ मुस्कान से उसका स्वागत करते हुए मैंने कहां। प्रत्युक्तर में उसने गर्दन हिला दी।
‘‘पढ़ोगे?’’ मैं आश्वस्त होना चाहती थी। उसने दुबारा ‘हां’ में गर्दन हिला दी।
ठीक है मैंने मेज की ड्रावर खोलते हुए एक नई काॅपी पेन्सिल निकाली। शाम को ही उसके लिए खरीद कर लायी थी। काॅपी पेन्सिल उसकी ओर बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहती थी तभी ख्याल आया काॅपी पर इसका नाम तो लिख दूं।
‘‘तुम्हारा नाम लिख देती हूं।’’
नुकीली पेसिंल से मैंने उसका नाम सुन्दर अक्षरों में लिख दिया। अंग्रेजी लिपि में DLICHAND । वह देख रहा था। उसकी नजरे कौतुकी थी। मैंने महसूस किया कि उसे अच्छा लग रहा है। पहला पेज खोल उस पर कुछ आड़ी, तिरछी व सीधी रेखाएं खींचते हुए मैंने उसे समझाया -
‘‘ये देखो - ये सीधी, ये आड़ी और ये तिरछी रेखा है। इसे तुम भी बनाओ। यहां बैठकर।’’ पास की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा।
उसने काॅपी पेसिंल उठाई और उसे देखने लगा। मैंने उसे बैठने और रेखाएं खींचने के लिए फिर से कहा और अपने काम में लग गई।
मेरे सामने कागज फैले पड़े थे। गाढ़े पीले नीले रंगों को उठाया और अपने काम में मशगूल हो गई। मेरे हाथ से तेज मेरा दिमाग दौड़ रहा था। रंग आकृतियां बनाने लगे। धीरे धीरे एक पूरा आकार बनकर तैयार हो चुका था। मेरी एकाग्रता भंग हुई तो पास बैठे दलीचंद पर निगाह गई। वह मुझे व मेरे काम को देख रहा था अपलक। उसकी काॅपी में केवल एक सीधी रेखा खींची हुई थी।
‘‘अब तक केवल इतना ही किया...? देखो मैंने तो अपना पूरा एक काम कर लिया।’’ अपना काम उसे दिखाते हुए मैंने कहा।
‘ये क्या है?’ उसने रंगो की ओर इशारा करते हुए पूछा।
‘‘कलर्स है। तुम्हें चाहिये?’’
मैंने देख रही थी कि वह ललचायी नजर से उन्हें देख रहा था। मेरे पूछने पर उसने हां तो नहीं की पर उसके चेहरे पर खुशी का भाव था। मैंने उसे लाल रंग की पेंसिल थमाते हुए कहा - ‘‘लो इससे बनाओ सारी सीधी रेखा।’’
उसने पेंसिंल ले ली। अपनी पतली अंगुलियों के बीच पेंसिल फंसाये वह रेखा खींचने लगा। लगभग दो मिनिट से भी कम समय में उसने सारी सीधी रेखाएं खींच दी थी।
‘‘वाह! खूब। अब ये नीले रंग की पेंसिल लो। सारी आड़ी रेखाएं इससे बना दो।’’ रंग भरी पेसिंल पकड़ते हुए उसमें उत्साह समा गया और उसने फटाफट अपने काम को अंजाम दे दिया। अब बारी हरे रंग की तिरछी रेखाओं की थी। मुझे कुछ कहना नहीं पड़ा। दलीचंद के हाथ फुर्ती से बात पकड़ रहे थे। उसकी बुद्धी पर मुझे संतोष हुआ।
‘‘तुम शीघ्र ही अक्षर सीख लोगो। होशियार हो।’’ अगले पेज पर मैंने अंग्रेजी लिपि का ‘ए’ बनाकर उसे समझाया। ए को मैंने तीनो ही रंगों से डिजाईन किया। कुछ समय लगा पर दलीचंद की गाड़ी दौड़ पड़ी रंगों की डगर पर अक्षरों की सवारी लिए हुए।
यह एक अखबार का कार्यालय था जहां मैं विज्ञापन विभाग में काम करती थी। कई विज्ञापन हर रोज के आते थे। उन्हें सेट करना, डिजाईन करना, रंग,भाषा और लिपि देखने संबंधित कई कामों को गहराई से देखना परखना और जांच करना पड़ता था। पसंद नहीं आने पर नये लुक देना रोज पानी खोजने जैसा दुरूह कार्य काम है। परन्तु मेरी दिलचस्पी शुरू से ही सजृन और कला में रही है तो मैं यह काम बखूबी कर लेती थी।
यह मैं जिस समय की बात कर रही हूं उस समय कम्प्यूटर का इतना चलन नहीं था। ज्यादातर काम प्रिंटिग के पारम्परिक तरीको से होता था। अतः मशीनो के बजाय मानव श्रम से काम पूरे किये जाते थे। आज तो अत्याधुनिक छपाई मशीने आ गई है। डिजाईन का अधिकांश कार्य भी कम्प्यूटर के एक कमांड द्वारा सम्पन्न हो जाता है।
उस समय मुझ जैसे सृजन क्षमता वाले डिजाईनर कम ही हुआ करते थे। मैं अपने काम में भरपूर नये प्रयोग करती थी। यहां सभी मेरे काम से खुश थे। थोड़े ही दिनों में मैंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली। उस दिन दलीचंद जब मुझे पूछता हुआ कार्यालय आया था तो चपरासी ने उसे मुझ तक पहुंचा दिया था।
चपरासी चाय ले आया।
‘‘चाय पीओगे?’’ मैंने दलीचंद से पूछा। उसने जवाब नहीं दिया। जिसे मेंने हां समझा। उसके लिए भी चाय मंगवा ली। चाय खत्म होने के बाद मैंने पेंसिल उठाई और अगले पेज पर गोला बना दिया। गोला बनाकर काॅपी दलीचंद की ओर बढ़ा दी।
तभी सूचना आयी, ऋषभ सर बुला रहे है। वे यहां सब एडीटर अर्थात उपसंपादक है। अखबार का ले-आऊट वे ही तैयार करते है। मेरे द्वारा तैयार विज्ञापन के एप्रूव करने का जिम्मा भी उन्ही का था। मैंने संबंधित फाईल अपनी टेबिल से उठाई और सर के पास चली गई।
मैं जब वापस लौटी तो एक घंटा गुजर गया था। दलीचंद खिड़की पर खड़ा दौड़ती सड़क को निहार रहा था।
‘‘काम कर लिया?’’ मैंने उसकी काॅपी देखी। वह गोले से आधा पेज भर चुका था।
‘‘पूरा क्यों नहीं किया?’’ अभी तो तुम्हें हाफ सर्कल भी बनाना है।’’ वह मेरा मुंह देखने लगा।
‘‘कोई कठिनाई है?’’ बोला तो वह कुछ नहीं पर अनमना सा आकर फिर मेज के किनारे स्टूल पर बैठ गया। मेरे बताये अनुसार वह काम करता रहा। इस तरह उसने अंग्रेजी के तीन अक्षर ए बी और सी सीख लिया।
लंच का समय होने वाला था। इसे भी भूख लगी होगी। ‘‘टिफन लाये हो अपना?’’ वह हां में शर्माता हुआ मुस्कुराया।
‘‘खा लो।’’
मेरे कहने पर उसने अपने निकर की जेब में हाथ डाल कपड़े की पोटली निकाल ली। मैं देख रही थी-

बेसब्री से पोटली का खोलना।
लुकी बाटी का निकालना।
चटनी के साथ कौर का चबाना।
क्षुधा शान्ति भाव का पसरना।
लौटा भर पानी का पीना
तृप्त होकर डकार का लेना।
चेहरे पर सन्तुष्टि का तैरना।

‘‘अब तुम्हारी छुट्टी।

शुक्रवार, 28 मई 2010

उसने कहीं दूर किसी ओवर फ्लाई की ओर इशारा करते बताया कि उसकी छाया में झोपड़ी तान रखी है। वह अपने घर गांव के बारे में बताने लगी-


पहले जब वह छोटी थी तब इस महानगर से सटे गांव में रहती थी। बहुत छोटी थी तब ही उसकी मां गुजर गई। पिता ने उसकी शादी दल्ला के पिता से करा दी। शादी के समय उसकी उम्र नौ-दस साल थी। शादी के बाद काम की तलाश उन्हें इस महानगर में खींच लायी। गांव में खेती जमीन थी। पर सारी जमीन महाजन खा गया। पैसा लिया था उससे खेत गिरवी रखकर। जब खेत न रहे तो वह इस महानगर में चले आये। बहुत भटके। फाके भी रहे। पर धीरे धीरे गुजारा होने लगा। कभी आधे पेट भोजन मिला तो कभी दूसरो के आगे हाथ भी फैलाना पड़ा। तीन बच्चों में दल्ला सबसे छोटा है मेडमजी, चाहूं कि यह पढ़लिख जाय।
- चाहती हो तो पढ़ने भेज दो।
-आप ही कहीं कोशिश करो। ये स्कूल जाने लगे तो मैं आपका बड़ा अहसान मानूं दीदीजी।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू आंखों से लगाते हुए कहा।
-इसकी उम्र कितनी है?
-ग्यारह बारह का हो गया होगा।
-अक्षर वगैरह लिख लेता है?
दल्लू · ऐ! दल्लू · · मां ने पुकारा तो दल्ला झूला छोड़ इधर चला आया।
-हाथ जोड़ मेडमजी को।
मां के कहने पर उसने अभिवादन किया। बता मेडमजी क्या पूछे है? जो पूछे उसका जवाब दे।
‘‘अक्षर वगैर लिख लेते हो?’’ मैंने प्रश्न दोहराया। वह मुंह ताकता कुछ देर खड़ा रहा। फिर ‘ना’ में गर्दन हिला दी।
ए.बी.सी.डी...एक दो तीन चार कुछ तो आता होगा। मेरे पूछने पर उसकी गर्दन फिर ना में हिल गई।
ओह! मेरे मुंह से निकल पड़ा। मैं सोच में पड़ गई । इसकी उम्र इतनी छोटी भी नहीं की इसे कहीं पहली क्लास में दाखिला मिले। मुझे सोचता देख वह बोल उठी -
‘‘मेडमजी आपका बड़ा उपकार होगा। यह थोड़ा पढ़लिख जाय तो कम से कम इंसान बन जायेगा। इसके बाप के साथ हमारा जीवन भी कूड़ा उठाते गुजर गया पर ये तो... ये काम ना करें। पर पढ़ेगा तो ही छुटकारा होगा।’’
‘‘बात तो तुम्हारी ठीक है पढ़ेगा तो ही सच्चे मायने में इंसान बनेगा।
‘‘पढ़ाई कर ले तो कहीं बही खाता लिखने का काम मिल सके है मेडमजी?’’ उसने आशा से मुझे देखा।
‘‘हां हां क्यों नहीं। पढ़ेगा तो बही खाता लिखने का क्या इससे भी ऊंचा काम कर सके है।’’
‘‘बस यहीं चाहू हूं मेडमजी। जरा लायक आदमी बन जाय। पहली दो तो लड़कियां थी सो चल गया। नहीं पढ़ी तो भी शादी कर दी और वो ससुराल चली गई। पर ये तो लड़का है। पढ़ेगा तो....कहीं अच्छे से काम करने लगे....।
‘‘वो तो ठीक है दल्ला की मां....’’
‘‘मेडम जी हूं तो लच्छू की घरवाली, पर जिसे देखो वहीं मुझे दल्ले की मां कहकर ही पुकारे है।’’ अपने बेटे को प्यार से सहलाते वह गर्वित भाव से बोली। मैं भी हैरान हुई उसे देखती रह गई। पहचान भी दे रही है पर अपने नाम से नहीं। मेरी तंद्रा भंग करते हुए वह बोली-
‘‘इसके बाप को भी बड़ा चाव है दल्ला पढ़े। उसने तो एक साहब से भी बात की इसके लिए। वो इसे पेट्रोल पम्प पर नौकरी लगवा देगा। बस थोड़ा हिसाब किताब करना सीख लो तो मेरा दल्ला पम्प पे काम करा करें। टोपी और वर्दी में सजा हुआ।
मैं देखा कोई स्वप्न संसार उसकी आंखों में फैलता हुआ चेहरे पर पसर गया। आशा भरा सुख उसकी आवाज में घुल आया।
‘‘मेडमजी...’’
‘‘ठीक है।’’ मैंने स्वीकारा। दल्ला को मैं पढ़ाऊंगी।’’
वो खिल उठी। दल्ला पास में खड़ा इस सबसे बेखर उदासीन सा इधर उधर ताक रहा था। कॉम्पलेक्स की आवाजाही बढ़ गई थी। मैंने घड़ी पर नजर डाली। पूरा एक घंटा व्यतीत हो चुका था। मैंने उठते हुए कहा-
‘‘ उधर आश्रम रोड के उस पार मेरा ऑफीस है। दल्ला को वहां भेज देना। मैं उसे पढ़ाऊंगी। पहले थोड़ा अक्षरज्ञान हो जाये फिर उसके स्कूल की बात तय होगी। इस उम्र में अब उसे कोई भी पहली क्लास में लेने को तैयार नहीं होगा। पहले उसे कुछ पढ़ना लिखना सीखना होगा। उसने भी स्वीकार लिया कि वह कल से उसे मेरे पास भेज देगी पढ़ने के लिए।
‘‘हां जरा साफ सुथरा आना पढ़ने के लिए। नहाकर- मैंने उसे हिदायत दी। कॉपी पेंसिल किताब तो मैं ला दूंगी।’’ कहकर मैं चलने को हुई। वह बहुत खुश थी। मेरे पीछे-पीछे मेरा अनुसरण करने लगी।
‘‘कल बारह बजे।’’ मैंने कहां। ‘‘और हां अब से दल्ला नहीं इसका नाम होगा- ‘‘दलीचंद’’।
एक सपना जो अभी दल्ले की मां की आंखों में तैर रहा था। उसका एक रेशा मेरी आंखों में भी समा गया। ‘एक अच्छा काम। एक नेक काम होगा मुझसे। अगर इसे पढ़ा सकी तो एक जीवन संवर जायेगा।’ आनंद से भरा मन खुशी देने लगा। इस स्वपनजाल को लिए मैं लिफ्ट में बंद हो ऊपर चली आयी ।

अगली पोस्ट में - रंगो के साथी

शुक्रवार, 7 मई 2010

दलीचन्द

मुझे समझ नहीं आया था ये ‘बाड़ू’ क्या होता है? पहले पहल तो मैंने मना कर दिया। फिर उनके हाथ में भोजन के लिए बर्तन देख और कुछ दूसरे फ्लैट से भोजन लेते देख सहज अनुमान लगाया कि यह खाना मांग रहे है। मैंने देखा कोई बचा हुआ तो कोई सुबह का बना बासी खाना उनके बर्तनों में डाल रहे है। मैं भी उनके बर्तनों में खाना उलटने लगी थी। जैसा कि दूसरे फ्लैट वाले कर रहे थे। पर ऐसा करने पर मन में एक अजीब सा असंतोष होता-
‘दूसरो का कूड़ा ढ़ोओ, बुहारो, गन्दे रहो और भोजन बासी पाओ।’ मेरा मन अजीब सी दुविधा से घिर आता। ‘मैं दिया करूंगी ताजा खाना। शाम को थोड़ा खाना ज्यादा बना लिया करूंगी। थोड़ा उनके लिए भी बनाऊंगी। ये भी गर्म खाने का स्वाद चखे।’
द्वार की घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला। देखा वहीं मां बेटे। वही बर्तन। वहीं बाडू की पुकार। मैं जैसे इसी इंतजार में बैठी थी। गई और फटाफट खाना ले आई। क्योंकि मैंने बनाया था थोड़ा अधिक। अलग से निकाल भी था उनके लिए। मैं गर्म खाना ले आयी तो उसने बर्तन आगे बढ़ा दिया। बर्तन में पहले से खाना भरा हुआ था। मेरे हाथ रूक गये -
‘‘क्या दूसरा बर्तन नहीं है तुम्हारे पास। यह गर्म खाना है।’’ पहली बार उनसे संवाद स्थापित करते हुए मैंने कहा। वो कुछ अचकचाया। उसकी मां बोली - ‘‘दीदी इसी में डाल दीजिये।’’
‘‘कल दूसरा बर्तन ले आना गर्म खाने के लिए।’’ मैंने उसे हिदायत देते हुए कहा।
दूसरी शाम वह फिर आये थे बाडू लेने। नित्यकर्म की भांति। अलग बर्तन तो नहीं थे उनके पास। दल्ला ने जेब से मुड़ी-तुड़ी पॉलीथीन थैली निकाली। वह उसे आगे बढ़ाकर बोला - ‘‘मासी गर्म खाना इसमें डाल दीजिये।’’
‘‘ओह! थैली। पॉलीथीन तो नुक्सान करता है।’’
वह चुप। मुझे उपाय सूझा।
‘‘ठहरो’’ मुझे याद आया मेरे पास पुराना टिफिन है। मैंने उसमें भर कर खाना दे दिया। उसके चेहरे पर खुशी के भाव देख मेरा मन प्रसन्नता से भर आया।
अब जब भी मैं काम पर जा रही होती या किसी काम से वापस लौट रही होती उनसे नजरे मिल जाती तो दोनों मां बेटे मुस्कुरा उठते। आते जाते नमस्ते भी करने लगे। मुझे भी अच्छा लगता। अपरिचय के केन्द्र में एक छोटासा परिचय। इस विशाल कॉम्पलेक्स में कोई तो है जो मुझे पहचान रहा है। कितना अजनबीपन पसरा हुआ है यहां।
ये महानगर की अपनी जीवनशैली है शायद। मैं किसी को आपस में बात करते हुए नहीं देखती। सब अपने हाल में मस्त। अपने हिसाब से व्यस्त। कोई किसी से कुछ नहीं पूछता। कोई कुछ नहीं कहता। बस चारों ओर लोगो की भीड़। हजूम का हजूम है। या फिर रेला है। कहां से आ रहा है और कहा समाता जा रहा है। मरूधरा के रेतीले धोरे की तरह। बस फर्क इतना कि वहा बालू है और यहां मानव। इस भीड़ में यह अकेलापन और अजनबीपन। कभी-कभी मन में डर या झिझक भी पैदा करता।
मैं एक कस्बाई क्षेत्र से हूं। जहां का माहौल यहां से बिल्कुल परे है। वहां हर कोई हर किसी को पहचानता है। रास्ते में मिल जाने पर अभिवादन के साथ लगे हाथ कुशलक्षेम भी पूछ ली जाती है। वहां भी लोग मंदिर जाते है और यहां भी। कितना अंदर है यहां और वहां के परिवेश में। वहां के मंदिर पूजा अर्चना और आध्यात्म के साथ सूचना आदान प्रदान के केन्द्र होते है। जहां तमाम प्रकार की सूचना मिल जाती है। जन्म, मृत्यु और परिणय की। कहां किसके यहां जन्म हुआ है और किसकी मौत हुई। किसका विवाह है और किसका संबंध तय हुआ है। बड़ी बातांे से लकर छोटी मोटी बातों तक। पशु पक्षी से लेकर पेड़ पौधे तक। बस्ती वालों से लेकर पूरे नगर तक। अमीर से लेकर गरीब तक। हर किसी को हर किसी में दिलचस्पी कहीं कोई बेगाना नहीं।
ये महानगर कैसे बसे होंगे? गांव-नगर के लोगों ने ही तो मिलकर बसाया होगा इसे। बाद में देश के कोने कोने से आये होंगे रोजी रोटी की तलाश में। और फिर सब यहीं बस गये। विभिन्न समुदाय, भिन्न खानपीन, वेशभूषा, भाषा और संस्Ñति। आचार-विचार सबकुछ अलग-थलग। कितना दिलचस्प है।
मैं सोचती - ‘एक दूसरे के बारे में जानने की कितनी उत्सुकता होती होगी। मेरे कस्बे में तो यहीं होता है। कोई भी नया व्यक्ति आ जाय। पंचायत आ जुड़ती है। उसे कभी अनजानापन तो लगता ही नहीं। देर सवेर वे उसे अपना बना ही लेंगे।’
जब से मैं यहां आयी हूं मेरी कस्बाई सोच और यहां यह महानगर, दोनों में घमासान मचा रहता।
छुट्टी का दिन था। मुझे ऑफीस नहीं जाना था। देर से उठी तो सारे काम ही देर से शुरू हुए। चाय के कप के साथ ताजा अखबार लिए मैं बालकनी में आ बैठी। बालकनी से नीचे गार्डन की ओर नजर गई। देखा, दल्ला झूला झूल रहा था। कॉम्पलेक्स में यह बच्चों का गार्डन था। जिसका पूरा परिदृश्य मेरी बालकनी से नजर आता था। गार्डन में झूले के साथ कई चढ़ने-उतरने-फिसलने व संतुलन साधने जैसे खेल उपकरण लगे हुए थे। इन्हें देख मुझे अपना बचपन याद हो आता। मेरी चाय खत्म हो चुकी थी और अखबार भी मैं टटोल चुकी थी। इच्छा हुई नीचे गार्डन में जाऊं। वहां कुनकुनी धूप खिली हुई थी। गुलाबी ठण्ड में सुबह की धूप का आनंद लेने के लिए मैंने फ्लैट को लॉक किया और लिफ्ट से नीचे चली आयी।
देखा दल्ला अब फिसलपट्टी पर चढ़ा हुआ था। फिसलने के लिए। उसकी मां परिसर बुहार रही थी। सामने लगी गार्डन की बेंच पर मैं जाकर बैठ गई। पूरा परिसर शान्त छुट्टीमय था। हर रोज की हलचल इन लम्बे टॉवरों में दुबकी निद्रामग्न थी। मैंने दृष्टि घुमाई, चारों ओर ऊंचे ऊंचे टॉवर। जिनमें अनगिनत फ्लैट। फ्लैट में कितनी बालकनी और बालकनी में सूखते टंगे हुए असंख्य कपड़े।
‘कितने लोग रहते होंगे यहां? कितने परिवार होंगे? कितने बच्चे होंगे? एक के बाद एक प्रश्न कौंध रहे थे मन में। इस पूरे कॉम्पलेक्स में तो मेरा पूरा गांव समा जाय। क्या हो जब वे सब एक जगह, एक छत के नीचे हो तो ? आपस में बतियाने में शायद खानापीना ही भूल जाय। तंद्रा में खोये हुए कई विचार आ जा रहे थे।
‘‘नमस्ते मेडमजी। कैसी है?’’
‘‘अच्छी हूं।’’
बात का सिलसिला खत्म हो चुका होता अगर वह वहां मेरे पास आकर दूब पर नहीं बैठ गई होती।
‘‘कहां रहती हो?‘‘ मैंने बात के क्रम को आगे बढ़ाया।
-शेष अगली पोस्ट में

बुधवार, 5 मई 2010

उड़ान


महानगर


---ये हैं हमारे महानगर। जिसकी गोद में उग आया है कंक्रीट का समंदर। विशालकाय इमारते और उनमें जगमगाती रोशनी का भंवर। किसी स्वप्नलोक की भांति खींचती है आदमी को। अपने अंदर असीम आर्कषण शक्ति लिए है ये महानगर। जो भी अपने सपने लेकर यहां आया है उसने पाये है।
---भागती दौड़ती जिन्दगी यहां की न रूकती है न कभी थकती और न ही कभी ठहर कर देखती है। लक्ष्मी पुत्रों की रमणीय स्थली बने ये महानगर दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ते जा रहे है। गांव, नगर, कस्बे सबकुछ इसमें समाहित होते जा रहे है।
---हमारा बहुत कुछ बदल कर रख दिया है इन महानगरों ने। आदमी, आदमी ना रहा गोया मशीन का पुर्जा हो गया। शोर और रफ्तार के बीच दम तोड़ता बचपन आज भी यहां का शा्श्वत सत्य है। बचपन रीतता गया और तरूणाई लुट गई। कभी न खत्म होने वाली यह दास्तान महानगर की छाती पर पड़े फफोले की भांति आज भी दर्द से टीसती है।
---अगर सत्य कहीं छिपा है इस महानगर में तो ठीक उसी तरह, जिस तरह नारियल के खोल के भीतर का पानी। आज भी.....उसी तरह.....जिस तरह.....बचा है आदमी के आंख का पानी। कहीं अनकहीं, गढ़ीं अनगढ़ीं दास्ताओं के बीच की है ये कहानी -



बरसों पहले की बात है- मैं साबरमती नदी के किनारे बने ‘सुपर कॉम्पलेक्स’ के ‘जी’ ब्लॉक में रहती थी।
अभी मैं यहां नई-नई थी। अड़ौस पड़ौस किसी को इतना पहचानती नहीं थी। अपने पास वाले फ्लैट में कौन रहता है? यह भी मुझे मालूम नहीं था।
ठीक सामने आश्रम रोड के उस पार मेरा ऑफीस था। ऑफीस पहुंचने के लिए मुझे नौ बजे घर से निकलना होता था।
जब मैं अपने फ्लैट को बंद कर रही होती तो अक्सर एक बच्चा अपनी मां के साथ कूड़ा उठाता नजर आ जाता। (उसे बच्चा कहना भी गलत होगा। वह किशोरवय पकड़ चुका था। बारह तेरह साल के आसपास उसकी उम्र होगी। और इस उम्र के बालक को किशोर कहते है)
उसकी मां उसे ‘दल्ला’ कहकर पुकारती थी। जब मैं ऑफीस जाने के लिए फ्लैट से निकल रही होती थी तब दल्ला कचरे का बड़ासा डिब्बा उठाये.....
उठाये कहना भी गलत होगा क्योंकि वह उसे सीढ़ियों से घसीटता हुआ नीचे उतारता था। घसीटने से पैदा होने वाला शोर बड़ा कर्कश और कान फोड़ू होता। और वह इस सबसे बेखबर हर सीढ़ी से डिब्बा कूदाता, घसीटता हर माले पर रूकता। जहां से डोर बेल बजा बजाकर हर फ्लैट का कचरा जमा करता जाता।
नाटे कद का, मैले कपड़े पहने स्याह वर्ण वाला दल्ला, कई दिनों का बिना नहाया हुआ अपनी मां के साथ काम में लगा हुआ नजर आता। उसकी मां भी उस जैसे गंदे और फटे वस्त्रों में कभी केम्पस के लम्बे चौड़े परिसर को बुहारती नजर आती थी। तो कभी कॉम्पलेक्स के बाहर बने ‘टी स्टॉल’ पर मां-बेटे चाय सुड़कते नजर आते। वे मुझे और मैं उन्हें पहचानने लगी थी।
अगली पोस्ट में दलीचन्द -

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

अण्डों की चोरी

गतांक से आगे -
ईल्ली के कीटाणुओं ने अपनी आबादी कई गुना बढ़ा ली थी। हर जगह उनकी कोलॉनियां बस चुकी थी। अपना फलता फूलता व्यापार देख नानी और ईल्ली बहुत खुश और संतुष्ट थी।
काम की अधिकता से नन्ही ईल्ली थक जाती थी। एक दिन जब वह थकी हुई आराम कुर्सी पर बैठी विश्राम कर रही थी तो उसे नानी ने याद दिलाया, ‘‘मेरे अण्डों का क्या हुआ ईल्ली’’ जाकर जरा देख तो आओ अब तक तो अण्डों से वयस्क मक्खियां बन चुकी होंगी। हमें भी अपने काम में मददगारों की आवश्यकता है।’’
‘‘हां नानी, ठीक याद दिलाया। अभी जाती हूं’’ कहती हुई ईल्ली ने गौशाला की ओर उड़ान भरी।
गौशाला में ईल्ली को एक भी मक्खी नजर नहीं आयी। उसे आश्चर्य हुआ। कि नानी के सौ-डेढ़ सौ अण्डों में से क्या एक भी मक्खी नहीं बन पायी। उसने अडौस-पड़ौस में पूछताछ शुरू करी साथी कीट पंतगों से पूछा तभी एक चींटे ने ईल्ली को बताया कि उसने कुछ दिन पूर्व दीमकों के तुंड सैनिको को देखा था जो बोरों में भर कर अण्डे ले जा रहे थे। हो सकता है वो अण्डे तुम्हारे ही हो। अजीब किस्म के जीव हो तुम अण्डे देने के बाद तुमने उन्हें संभाला तक नहीं चींटे ने बुरा सा मुंह बनाया और आगे बढ़ गया। नन्ही ईल्ली परेशान। उड़ती-दौड़ती चींटे के पास पहुंची-
‘‘चींटेराम, चींटेराम उन तुंड सैनिको का कुछ पता ठिकाना तो बता दो। हाय! कहां ले गये वो हमारे अण्डे।
‘‘तुम जैसी लापरवाह प्रजाति का यही हाल होता है।’’
‘‘नहीं-नहीं ऐसा मत कहो चींटेराम, कृपया मुझे दीमकों का पता बता दो। मैं उन्हें ढूंढ लूंगी।’’
‘‘वह दूर उस पेड़ पर उठे हुए टीले को देख रही हो न।’’ चींटे ने केवल इतना ही इशारा किया और आगे बढ़ गया। चींटा तो स्वभाव से ही मनमौजी था। किसी से अधिक बातचीत करना उसे पसन्द नहीं था।
नन्ही ईल्ली पेड़ के इर्द गिर्द भिनभिनाने लगी। ‘बाबा रे! यहां से वापस अण्डे लेना बहुत मुश्किल है। यह तो दीमकों का किला है। पूरा का पूरा भूमिगत, जमीन के नीचे गहराई तक फैला हुआ। जिसकी प्रत्येक सुरंग के द्वार पर रखवाली करते हुए बड़े सिर और बड़े शरीर वाले चौकन्ने पहरेदार। अब क्या किया जाय।’ वह सोचने लगी।
काफी देर सोचने के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं सूझा। निराश हो वह लौट पड़ी। मन की निराशा के कारण उसे थकान महसूस होने लगी वह सुस्ताने के लिए पेड़ के नीचे छाया में बैठ गयी।
परेशान ईल्ली गुनगुनाने लगी।
ओ प्रकृति की रानी
सुन ले मेरी कहानी
मैं हूं एक नन्ही मुन्नी
राह बहुत मुश्किल है
काम कठिन है
हिम्मत कम है
अब तू ही बता
कैसे खुश होगी मेरी नानी
तभी उसके स्वर में स्वर मिलाता उसे
बांसुरी का स्वर सुनायी दिया वह चौंक पड़ी, ‘‘कितना अदभुत स्वर है। कौन है यह बांसुरी वादक’’ ईल्ली ने देखा ऊपर पेड़ के पत्ते पर बैठा वही चींटराम बांसुरी की मधुर तान छेड़े हुए है।
ईल्ली की आंखे छलछला आयी। उसका गीत गाना बंद हो चुका था। उसे चुप देख चींटेराम ने भी बांसुरी बजानी बंद कर दी।
‘‘अण्डे मिले नन्ही मक्खी।’’
किन्तु ईल्ली मौन थी उसकी सिसकी नीरव वातावरण में गूंज उठी। उसकी पीली घेरदार पोशाक आंसुओं से भीग चुकी थी। उसका यह हाल देख चींटाराम को दया आ गई। वह पेड़ के पत्ते से नीचे उतर आया।
‘‘मैं जानता हूं तुम दीमक के किले तक नहीं पहुंच सकती आओ मेरे पीछे-पीछे आओ।’’ कहता हुआ चींटा बांसुरी बजाता आगे चल पड़ा। ईल्ली उसके पीछे थी।
अगली पोस्ट -
दीमक राजा और कैदी ईल्ली

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

एक दुर्घटना



गतांक से
आगे -

ईल्ली और नानी बगीचे की ओर जा रही थी। रास्ते में ईल्ली की ट्रक खराब हो गई। नानी आगे निकल चुकी थी इसलिए ईल्ली अकेली रह गई। रास्ता सुनसान था। ईल्ली ने ट्रक को ठीक करने की काफी कोशिश की किन्तु ट्रक चालू नहीं हुआ। अंधेरा छाने लगा था। ईल्ली इधर उधर जगह तलाशने लगी। चिन्ता में डूबी ईल्ली चक्कर काट रही थी कि एक वाहन से टकरा गई और बेहोश होकर नीचे गिर पड़ी।
इत्तफाक से खिता टिड्डे ने ईल्ली को टकराकर, गिरते हुए देख लिया था। वह बेहोश ईल्ली को अपने तम्बू में ले आया।
टिड्डी दल के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने ईल्ली का इलाज शुरू कर दिया। उसके पंखों पर सबसे अधिक चोटे आयी थी। डॉक्टरों ने पंखों पर मलहम लगाकर पट्टियां बांध दी।
कुछ देर बाद ईल्ली को होश आया वह कराही, ‘‘मैं कहां हूँ?’’
‘‘सेनानायक खिता को सूचित किया जाय। इस मक्खी को होश आ रहा है’’ डॉक्टर टिड्डे ने नर्स टिड्डी को आदेश दिया और पुन: उपचार में जुट गया।
ईल्ली को होश आ चुका था। उसने अपने आपको टिड्डी डॉक्टरो से धिरा पाया जो उसके पांवों पर पट्टियां बांध रहे थे। उसके अंग प्रत्यंग में दर्द हो रहा था। उसने देखा, ‘‘यह तो ऑपरेशन का कक्ष है। वह यहां कैसे आ गई। उसके बदन में दर्द क्यों है? और उसके पंख . . . . . ’’ तभी सामने सेनानायक खिता को आता देख वह चौंकी -खिता तुम?
‘‘हां ईल्ली मैं खिता। तुम्हारा एक्सीडेन्ट हो गया था और तुम बेहोश होकर गिर पड़ी थी। मैं ही तुम्हें यहां उठा लाया। खिता के कहने के साथ ही ईल्ली को सब याद आने लगा कि कैसे बीच रास्ते उसकी ट्रक खराब हो गई और वह नानी से बिछुड़ गई-
ओह! तो नानी मुझे न पाकर परेशान हो रही होगी। ईल्ली को चिन्ता हुई।
‘‘मैंने तुम्हारी नानी के पास सूचना भिजवा दी है। सुबह तक वह आ जायेगी।’’ खिता ने आगे कहां, ‘‘तुम आराम करो ईल्ली। तुम्हारे पंखों पर सबसे अधिक चोट लगी है। किन्तु तुम धीरज रखो। हमारे कुशल चिकित्सक पंखों का ईलाज करने में बहुत होशियार है। तुम जल्दी ही ठीक होकर उड़ान भरने लगोगी . . . . . ’’
‘‘. . . . .और मेरी सुरीली आवाज?’’ ईल्ली को आशंका हुई कि कहीं चोट के कारण उड़ते समय पंखों से भिनभिनाहट की आवाज न हुई तो।?
‘‘यह ठीक होने पर ही मालूम होगा ईल्ली कि तुम्हारे पंख पहले जैसी सुरीली आवाज में कम्पन कर पाते है या नहीं। वैसे हम पूरी कोशिश में जुटे है कि तुम्हारा मधुर स्वर बना रहे।’’ एक टिड्डे डॉक्टर ने ईल्ली को सांत्वना देते हुए कहा।
‘‘ओह! धन्यवाद डॉक्टर।’’ ईल्ली ने डॉक्टर से कहा फिर वह खिता से कहने लगी। ‘‘मैं तुम्हारी भी आभारी हूँ खिता। सचमुच तुम एक दयालु और नेक टिड्डे हो।’’
टिड्डे डॉक्टरों और नर्स टिड्डियों के सामने एक सुन्दर मक्खी से अपनी प्रशंसा सुन खित टिड्डा फूला नहीं समाया। खुश हो वह गीत गुनगुनाने लगा।

कल होगी एक सुन्दर सुबह
ताजी बहेगी हवाएं
उड़न झूलों पर हवा बैठकर आयेगी
एक सलोनी मक्खी को
संग अपने उड़ा ले जायेगी
उसकी पोशाक का
लाल पीला रंग
दूर आसमान में
पतंग बन
लहर लहर लहरायेगा।
कल होगी एक सुन्दर सुबह इन्द्रधनुष पुल बनायेगा
सतरंगे रंग आसमान में छितरायेगा।
एक सलोनी मक्खी को
संग अपने उठा ले जायेगा
इन्द्रधनुष पर बैठी
ईल्ली रानी
को देख हर कोई ललचायेगा
कल होगी एक सुन्दर सुबह
मधुरम, सुनहरी किरणे
अपने रथ में बिठायेगी
दूर गगन में
हीरे जैसी ईल्ली चमचमायेगी।
कल होगी एक सुन्दर सुबह
ईल्ली रानी पंख फैला उड़ जायेगी।
खिता के मधुर गीत से ईल्ली का दर्द कम होने लगा था। खिता ने मन भरकर गीत गाया। वह इससे बढ़कर भला ईल्ली की और क्या मदद कर सकता था। दर्द बांट ही तो सकता था। हुआ भी यही ईल्ली अपने आपको काफी स्वस्थ महसूस कर रही थी।
‘‘तुम्हें भूख लगी होगी ईल्ली परन्तु हमारे यहां तो सिर्फ हरे पत्ते हीं है खाने के लिए. . .’’ खिता बोला।
‘‘नहीं खिता मैं पत्तों का पर्णहरित नहीं खाती। क्या तुम नहीं जानते कि हम मक्खियों का भोजन अलग तरह का होता है और लेती भी अलग ढंग से है।’’
‘‘मुझे मालूम है ईल्ली तुम केवल तरल रूप में भोजन को चूस सकती हो। परन्तु तुम्हारे लिए अंधेरे में भोजन लाना बहुत मुश्किल है।’’
‘‘ओह खिता! फिर तो मुझे भूख के मारे नींद नहीं आयेगी।’’ ईल्ली की बात सुन खिता को अफसोस हुआ। परन्तु किया क्या जा सकता था। अब जैसे तैसे रात तो गुजारनी ही थी। खिता रात गुजारने के लिए ईल्ली को अपनी यात्राओं के रोचक वर्णन सुनाने लगा।
कहानी खिता की
ईल्ली तुम्हें मालूम है हम अफ्रीका के रहने वाले है। भोजन की खोज में हमारे विशाल दल दूर-दर तक निकल जाते हैं।
‘‘तुम्हारें दल में कितनी टिड्डियां है खिता?’’ ईल्ली ने पूछा।
‘‘हमारी गिनती का हिसाब अलग तरह से होता है ईल्ली। एक वर्ग किलोमीटर में करीबन पांच करोड़ टिड्डियां होती है। हमारे दल के विस्तार का अब तुम ही अनुमान लगा लो। हमारा दल एक सौ पचास वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। दिन में जब हम एक साथ उड़ती है तो सूरज भी छिप जाता है। एक बार लाल सागर पार करते समय हमारा दल पांच हजार वर्ग किलोमीटर तक फैल गया था।
इसी बात से तुम हमारे द्वारा हरी वनस्पति खाने की ताकत का पता लगा सकती हो। हम जहां भी आक्रमण करते है वहां की खड़ी की खड़ी फसल समूल नष्ट हो जाती है। एक पत्ता तक नहीं बचता। अकाल की स्थिति बन जाती है।
ओह! तुम्हारा टिड्डी दल तो बहुत ताकतवर है खिता। इस हिसाब से तुम प्रतिदिन कितनी ताजी वनस्पति खा जाते हो?
हम लोग करीबन 100 टन वनस्पति का भक्षण एक दिन में कर डालते हैं।
आश्चर्यजनक खिता आश्चर्यजनक। तुम लोग बहुत खाते हो।
हाँ ईल्ली हमें परिश्रम भी तो बहुत करना पड़ता है। हम बिना रूके लगातार पंद्रह से सत्रह घंटे तक उड़ सकते है। एक हजार किलोमीटर से लेकर पन्द्रह हजार किलोमीटर तक की दूरी तय करना हमारे लिए दुष्कर कार्यं नहीं है। विस्मय से गिरी ईल्ली को खिता आगे बताने लगा-
एक बार की बात सुनाई ईल्ली हमारे दल ने अफ्रीका के तट से अटलांटिक महासागर के लिए उड़ान भी। तब मैं सेनानायक नहीं था। नया-नया ही उड़ना सीखा था धीरे उड़ने के कारण मैं और मेरे जैसे कुछ साथी हमारे दल से पीछे छूट गये और रास्ता भटक गये।
‘‘तब?’’ ईल्ली ने उत्सुकता से पूछा।
तब क्या करते। मैंने उस समय सबका नेतृत्व किया। कुछ दूर उड़ने के बाद हमें एक जलयान नजर आया। वहां अपने साथियों सहित उतर कर विश्राम किया।
उस जलयान के रोचक संस्मरण तुम सुनोगी तो दंग रह जायेगी।
‘‘प्लीज खिता सुनाओं न! मुझे बहादुरी से भरे किस्से बहुत पसन्द हैं। मैं बहादुरों का न केवल आदर करती हूँ बल्कि उन्हें प्यार भी करती हूँ।
हां तो ईल्ली सुनो उस विराट जलयान में खाने के नाम पर हरी वनस्पति का एक पत्ता भी नहीं था। ऐसे में हमारे साथ थी एक मादा टिड्डी। उसे अण्डे देने थे। इसके लिए हमें वहां एक-डेढ़ महीना बिना भोजन के ठहरना पड़ा।
शायद तुम्हें मालूम नहीं हमारी जाति की मादा टिड्डी एक बार में अस्सी से लेकर 150 तक अंडे देती है। जिनसे लगभग पन्द्रह दिन बाद बच्चे निकल आते है जिन्हें हम फुदक कहते हैं।
फुदक! फुदक क्यों खिता?
क्योंकि बच्चे उड़ नहीं सकते। तीन सप्ताह बाद जब वह बड़े हो जाते है तब ही उन्हें उड़ना आता है। इससे पहले वह सिर्फ फुदकते रहते है अत: हम लोग उन्हें प्यार से फुदक ही कहते है।
ईल्ली हंसने लगी।
‘‘बड़ा अच्छा लगता है सुनने में बच्चों का नाम ‘फुदक’ ‘फुदक’ ‘फुदक’ दो तीन बार कहती हुई ईल्ली फिर हंस दी।
ईल्ली को हंसता देख खिता टिड्डा खिलखिला पड़ा। दुर्घटना ग्रस्त ईल्ली का मन बहला कर खिता को खुशी हो रही थी। इस तरह की बातों से कभी आश्चर्य तो कभी हंसते हुए पूरी रात गुजर गई।
सूरज की पहली किरण ने उनके तम्बू को छुआ। सुबह के उजाले को देख ईल्ली के हाथ पांवों में हरकत होने लगी। उनकी अकड़न खुलने लगी थी। दोनों हाथों को ऊपर किए आलस तोड़ती हुई ईल्ली खिता से बोली-
तुममें अच्छे मित्र के सभी गुण है खिता। दर्द और भूख के दौरान तुमने पूरी रात मुझे रोचक संस्मरण सुनाकर आसान कर दी। तुमने मेरी काफी मदद की खिता। तुम्हारा अहसान में कभी नहीं भूलूंगी। मैं अपनी डायरी में तुम्हारे रोचक संस्मरणों को जरूर लिखूंगी।
टिड्डी डॉक्टरों ने ईल्ली ने पंखों पर बंधी पट्टियां खोल दी ईल्ली ने पंख फड़फड़ाये। वह उड़ने के लायक हो चुके थे। बाहर नानी भी उसे लेने आ चुकी थी।
दोनों मक्खियों ने खिता टिड्डे को अलविदा कहा ईल्ली के जाने से खिता दुखी होने लगा इस पर वह बोली, ‘‘जीवन रहा तो फिर कभी मिलेंगे खिता। मित्र से मिलने पर खुशी होती है तो बिछुड़ने पर दुख भी। जिसे हमें झेलना ही होगा। शायद जीवन इसी का नाम है।’’ कहती हुई ईल्ली ने मुस्कुराने की नाकाम कोशिश की।
एक छोटी मक्खी की इतनी बड़ी बात सुन खिता ने भरे नेत्रो से ईल्ली को विदा दी।
घर पहुंच कर ईल्ली नानी के साथ अपने व्यापार में व्यस्त हो गई। सुबह जल्दी ही घर से निकलती थी और अंधेरा होने से पहले घरों को लौटती थी।

अगली पोस्ट में - अण्डों की चोरी

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

खिता से एक मुलाकात


गतांक से आगे -
इतने में नौकरानी मक्खी ने आकर सूचना दी कि, ‘‘आपसे मिलने एक टिड्डा आया है। वह आपसे कुछ खुफिया बात करना चाहता है।’’ इस पर रानी मक्खी ने उसे अन्दर भेज देने का आदेश दिया। नौकरानी मक्खी ने टिड्डे को अन्दर भेज दिया। सिर झुकाकर टिड्डा बोला-
‘‘नमस्ते रानी मक्खी। मैं अफ्रीका का प्रवासी यूथी टिड्डे दल का नायक ‘खिता’ हूं। हम लोग फसलों पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे है। चूंकि यह आपका क्षेत्र है इसलिए आपको सूचना देना आवश्यक समझा गया।’’
मान्य खिता, तुम फसलों पर आक्रमण क्यों करना चाहते हो? जानते नहीं आज के वैज्ञानिक युग में तुम्हें मार भगाने के कई तरीके ढूंढ लिए गये है। वे लोग तुम्हें मारने के लिए वायुयान से जहरीले कीटनाशकों का छिड़काव कर सकते है। जिससे न केवल तुम्हें बल्कि हमें भी खतरा रहेगा।’’ नानी मक्खी कुछ रूककर आगे बोली बेहतर यहीं है कि तुम चले जाओ। वर्ना तुम्हारे साथ हम भी मारी जायेंगी। क्योंकि तुम्हारी जितनी तेज गति से हम नहीं भाग सकती।
यह सुन खिता बोला, ‘‘रानी मक्खी हमारी विवशता को समझो। इस बार वर्षा अच्छी होने से फसलें अच्छी हुई है। हरी-हरी पत्तियों का पर्णहरित हमें बहुत पसन्द है। हमारा दल कल ही खेतों की ओर कूच कर जायेगा। और संभावना है कि दो तीन दिन में धावा बोल देगें। तुम लोग घरेलू मक्खियां हो बस्ती की ओर भाग जाना, खेतों की ओर मत जाना।’’
‘‘तुम्हारे इस आक्रमण से मेरा तो सारा व्यापार ही चौपट हो जायेगा। मैं कैसे अपने कीटाणुओं को जहरीले कीटनाशकों से बचा पाऊंगी। ईल्ली बेटी तुम ही समझाओ इसे कुछ।’’ रानी मक्खी ने ईल्ली की ओर देखकर कहा। इस पर ईल्ली ने खिता से कहा-
‘‘खिता क्या तुम 10-15 दिन नहीं ठहर सकते। प्लीज मेरे खातिर खिता वर्ना हमारे अण्डे भी बेकार हो जायेगे और हमें कई ट्रक कीटाणुओं का नुकसान होगा सो अलग।’’ ईल्ली ने खिता से इतने मोहक ढंग से आग्रह किया कि खिता इनकार नहीं कर सका।
‘‘सुन्दरी ईल्ली, तुम सुन्दर ही नहीं विनम्र भी हो। विनम्र स्वभाव वाला दूसरों का मन जीत सकता है। तुम्हारी बात मुझे स्वीकार है।’’ इतना कहने के बाद खिता उड़ने को हुआ किन्तु ईल्ली ने उसे शर्बत पिलाना चाहा तो नानी ने टोक दिया।’’ भला टिड्डे कहां जानते है मीठा शर्बत पीना वो तो बस चबर-चबर हरी पत्तियां चबाना जानते है। जानवरों की तरह।’’ कहकर हो! हो!! कर नानी हंस पड़ी ईल्ली को नानी का बेसमय हंसना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
खिता के बात मान लेने से यूथी टिड्डी दल के कारण आया संकट एक बार टल चुका था। ईल्ली और नानी फिर भविष्य की योजनाओं में व्यस्त हो गई। आज उन्हें कई ट्रक कीटाणुओं के कच्ची बस्ती में खाली करने थे। ट्रक के काफिले के साथ वह अपने माल को ले कच्ची बस्ती की ओर निकल पड़ी।
वहां उन्होंने पेचिश, तपेदिक और कुष्ठ रोगों के कीटाणुओं की खूब बिक्री की मुंहमांगी कीमत पर उन्होंने टाईफाईड के कीटाणु बेचे। उनके पास अभी काफी माल था किन्तु शाम होने से पहले उन्हें अन्य जगह भी कीटाणुओं को पहुंचाना था। अत: सभी कीटाणुओं को कोलोनी बसा लेने का आदेश दे वह ट्रको का काफिला लेकर आगे चल दी।
अच्छी जगह पाकर कीटाणु भी बहुत खुश थे। काफी समय से अच्छे वातावरण और भोजन के अभाव में खोल में बंद जीवन काट रहे थे। अब वह फटाफट अपनी संख्या बढ़ाकर आबादी बढ़ा लेंगे। विभिन्न तरह की दवाओं के आने से उनके जीवन को कई खतरे थे। अक्सर उनके बीच आयोजित गोष्ठियों में इसी विषय की चर्चा रहती - उन्हें चिन्ता थी कि यदि यही हाल रहा तो एक दिन वे समूल नष्ट हो जायेगें।
ऐसे में मक्खियां उन्हें हमेशा दिलासा देती। वे सब मक्खियों के आभारी थे वे न होती तो भला वे एक जगह से दूसरी जगह कैसे पहुंच पाते।

अगले अंक में पढे़ - एक दुर्घटना

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

नानी के अण्डे

गतांक से आगे -
‘‘नानी क्या बिना सही मौसम के भी तुम अण्डे दे सकती हो?’’ ईल्ली ने प्रश्न किया।
‘‘लगता है तुमने आज का अखबार नहीं देखा। उसमें मौसम विभाग के अनुसार अभी कुछ दिनों तक तेज गर्मी पड़ने का समाचार छपा है। तुम तो जानती ही हो कि हमारी प्रजाति केवल गर्मी और बसन्त ऋतु में ही अण्डे देती है। अत: अब गर्मी पड़ने की बात पढ़कर मैंने समय का उपयोग कर अण्डे देने की योजना बना ली है। आओ अब उपयुक्त जगह तलाशते है।’’ कहते हुए नानी मक्खी ने उड़ान भरी। पीछे-पीछे ईल्ली भी उड़ चली।
रास्ते में नानी ईल्ली से कहने लगी, ‘‘वैसे तो मुझे घोड़े की लीद, मुर्गियों की बीट, मनुष्य का मल, सड़े-गले फल और सब्जियों में अण्डे देना बहुत पसन्द है किन्तु. . . . . . .’’
‘‘किन्तु क्या नानी
‘‘वहां अण्डों के नष्ट होने का खतरा रहता है, आओ हम उस गौशाला की ओर चलते है।’’
दोनो मक्खियां वहां पहुंचती है जहां गोबर का विशाल ढेर लगा हुआ है जिसे देखकर नानी खुश होती हुई कहती है, ‘‘यहां मेरे बच्चे आसानी से पलेंगे। पांच सौ से लेकर छ: सौ अण्डे मैं एक ही बार में दे दूंगी।’’
‘‘बस इतने ही अण्डे नानी?’’
‘‘हां, बस एक बार में हमारी प्रजाति इतने ही अण्डे दे सकती है।’’ और नानी ने अण्डे देना शुरू किया। अभी उसने कुल सौ-डेढ़-सौ अण्डे ही दिये होंगे कि एक मेढ़की की नजर उस पर पड़ती है। घात लगाए वह आगे बढ़ती है और नजदीक और नजदीक पहुंचती जाती है जहां नानी मक्खी अण्डे दे रही थी। ईल्ली ने मेढ़की को आगे बढ़ते देख लिया था वह अपनी नानी को सतर्क कर पाती इससे पूर्व ही मेढ़की लसलसी जीभ एक झटके से बाहर निकलती है।
‘‘बाप-रे · ·’’ कहती हुई नानी उड़ी और उसके साथ-साथ ही ईल्ली भी। दोनो हांफती हुई घर पहुंचती है। घर नानी को मीठा पेय पीने को दिया जाता है, तब वह पुन: स्फूर्ति महसूस करती है। ईल्ली नानी के पंखों को सहलाती है।

अगले अंक में पढे़ - खिता से एक मुलाकात

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

ईल्ली और एनाफिलीज सिस्टर

वाह! वाह! नानी, तुम्हारे यहां तो कीटाणु व्यापार की काफी संभावनाएं है।
इतने में पीछे से गूं-गूं की सुरीली आवाज आई। ईल्ली चौंकी।
‘‘नमस्ते रानी मक्खी। यह कौन मेहमान साथ लायी हो?’’
‘‘पराई कोई नहीं, मेरी बेटी की बेटी है एनाफिलीज सिस्टर।’’ एनाफिलीज नाम सुनकर ईल्ली को आश्चर्य हुआ।
‘‘यह कोई विदेशी नागरिक है?’’
‘‘नहीं बेटी, इसका सिर्फ नाम ही विदेशी है। इसके माता-पिता ने रख दिया जो चल रहा है। रहती यह हमारे देश में ही है। इसका और हमारा धन्धा एक ही है।’’
‘‘धन्धा एक ही है क्या मतलब? क्या ये भी कीटाणुओं की व्यापारी है?’’
‘‘हां, बस फर्क इतना है कि हम कई तरह के कीटाणुओं का व्यापार मौसम के अनुसार करती है किन्तु एनाफिलीज मच्छर केवल एक ही तरह के कीटाणुओं की व्यापारिन है। बरसात के मौसम में इसका धन्धा जोरों पर चलता है।
इसके पास एक ही कीटाणु है ‘मलेरिया पैरेसाईट’। बस उसी को पेट में लिए घूमती है।’’
‘‘पेट में नानी?’’
हां-हां पेट में। इसके आमाशय में कीटाणु अपना आधा जीवन पूरा करते है। फिर मनुष्यों तक पहुंचाने के लिए इसे उन्हें काटना पड़ता है। बड़े जोखिम का काम है।
कई बार बेचारी काटते वक्त पकड़ी जाती है। इसके कुछ चालाक साथी तो उड़ जाते है और कुछ बचारे बेमौत मारे जाते है।
‘‘बहन, एनाफिलीज कोई और तरीका क्यों नहीं ढूंढ लेती तुम कीटाणु पहुंचाने का। ‘‘ईल्ली ने एनाफिलीज से कहा। ‘‘कीटाणु मुझे मनुष्य के खून में पहुंचाने होते है। जो सिर्फ मेरे मुंह से लार द्वारा ही जा सकते है। इसके लिए पहले मनुष्य की त्वचा को भेदना होता है। फिर हमारा भोजन भी मनुष्य का खून ही है। खून चूसने के साथ ही हम अपनी लार के जरिए कीटाणु छोड़ देती है।’’
‘‘तुम्हारे धन्धे में बहुत खतरा है’’ ईल्ली बोली एनाफिलीज कहने लगी- ‘‘टी.वी. नहीं देखती तुम ? रोज नित नए डाकुओं के विज्ञापन मेरे विनाश के लिए निकलते रहते है। कभी ये लगाओ, कभी वो लगाओ। कभी ये जलाओ, कभी वो जलाओ। ऐसे भगाओ वैसे भगाओ जाने कितनी तरह की मुसीबतें हमें अकेले झेलनी पड़ती है।’’
‘‘अकेले क्यों बहन? क्या तुम्हारे घर के मर्द काम नहीं करते?’’
‘‘अरे नहीं, हमारे मर्द न काम के न काज के दुश्मन अनाज के सारे दिन फूलों और फलों का रस चूसते रहते है। सिर्फ अपना पेट भरने का काम करते है। पेटू कहीं के, कभी-कभी हमें भी फंसा देते है।
एक हम मादा एनाफिलीज ही हैं जो बच्चों की तरह कीटाणुओं को पेट में पालती भी है और धन्धा भी करती हैं।’’
‘‘इनके व्यापार की एक खास बात जानती हो ईल्ली, तुम?’’ इतनी देर से चुप बैठी नानी बोली।
‘‘वो क्या नानी?’’
एक बार जो यह एनाफिलीज बहन एक स्वस्थ आदमी को काट ले और अपने कीटाणु जिसे ये प्लाज्मोडियम कहती है, मलेरिया फैलाने में कामयाब हो जाये तो इसकी अन्य साथिन बहनें उसी बीमार आदमी का खून चूसकर वापस कई कीटाणुओं को अपने पेट में भर लाती है। फिर इसके आमाशय की दीवारों में वे कीटाणु अपना आधा जीवन चक्र पूरा करते है।’’
‘‘क्या मतलब नानी?’’
‘‘मतलब यह कि इसके कीटाणु आधा जीवन चक्र मनुष्य के शरीर में और आधा जीवन चक्र इसके शरीर में पूरा करते हैं।’’
‘‘सचमुच आश्चर्यजनक है इनकी व्यापार शैली।’’
‘‘हां ईल्ली नानी ठीक कह रही है। हमारी çजाति के और भी मच्छर होते है जो दूसरी तरह के कीटाणुओं के व्यापारी है।
‘‘कौन-कौन है? जरा, मुझे भी बताना।’’ ईल्ली ने कौतूहल से पूछा।
‘‘क्यूलेक्स और एडीस’’
‘‘क्या सभी मच्छरों के नाम अंग्रेजी में होते है।’’ ईल्ली ने पूछा।
‘‘हां, वैज्ञानिकों ने रख दिये है। ‘‘वैसे नाम से क्या फर्क पड़ता है अंग्रेजी के हो या हिन्दी के हमें तो अपने व्यापार से मतलब। क्यूलेक्स मच्छर, डेंगू ज्वर और फीलपांव के कीटाणुओं का व्यापारी है। एडीस के पास पीत ज्वर के कीटाणु मिलते है।
‘‘तुम रहती कहां हो एनाफिलीज?’’
‘‘वो वहां दूर दलदल में। दरअसल मुझे नम जगह बेहद पसन्द है। वहां मुझे अण्डे देने में सुविधा भी रहती है। अब तुम ही देखो न! मैं एक बार में करीबन दो सौ से लेकर चार सौ तक अण्डे देकर निश्चित हो जाती हूं। फिर यही दलदल उन्हें पालता है। यहीं मेरे अण्डो में से लार्वा निकलता है और लार्वा से प्यूपा बनता है। मुझे उन्हें संभालने नहीं पड़ते।
अब तुम ही बताओ बहन, व्यापार करूं या बच्चे संभालू? एनाफिलीज अपनी स्कर्ट ठीक करती हुई बोली, अच्छा अब चलती हूं। कहीं दुश्मनों ने देख लिया तो पकड़ कर मसल ही डालेंगे।
अच्छा! अलविदा बहन फिर कभी मिलेगे। कहकर वे जुदा हो गई।
ईल्ली को आज मच्छर जाति के बारे में रोचक बाते जानने को मिली। सोच रही थी घर जाकर उन्हें जल्दी से डायरी में उतार ले। अत: उसने नानी से घर चलने का अनुरोध किया और दोनों मक्खियां घर की ओर अड़ चली।
रात नानी तो सो गई पर ईल्ली लैम्प की मद्धिम रोशनी में आज की डायरी लिखने में व्यस्त हो गई। इस बीच वह कब सो गई उसे पता ही नहीं चला।
सुबह नानी ने ईल्ली को उठाया और उसके सामने नक्शा फैलाते हुए कहने लगी-
‘‘देखो ईल्ली यह हरे निशान वाली जगहों पर हमें अपने कीटाणुओं की बस्ती बसानी है। ताकि उनकी आबादी बढ़ाई जा सके। खतरों वाली सारी जगहों को मैंनें लाल घेरे में ले लिया है। ये वो निशान है जहां हमारे ऐजेन्ट काली वर्दी में तैनात रहेंगे।
अच्छा अब हम चलते हैं, मैंने आज का दिन अण्डे देने के लिए चुना है. . . . .

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

ईल्ली और नानी

केशू पांचवीं कक्षा के आगे पढ़ नहीं सका क्योंकि वह अनाथ हो गया था। अकेले, निराश्रित केशू को पुस्तकों की दुकान वाले दयाल बाबू ने अपने यहां रख लिया। उसके चारों ओर विभिन्न विषयों की ढ़ेर सारी पुस्तके थी। वह एक-एककर इन सभी को पढ़ लेना चाहता था। यही सोच दुकान से लौटते समय वह एक पुस्तक घर ले आया जिसका नाम था ‘‘ईल्ली और नानी’’ सबके सो जाने के बाद बरामदे में जल रही मद्धिम रोशनी में वह पुस्तक पढ़ने लगा।
एक थी नन्ही मक्खी, नाम था ईल्ली, उसकी मां कीटाणुओं की व्यापारिन थी। उसके पास कई ट्रक थे जिनमें लादकर वह कीटाणुओं को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया करती। बाजार में कभी पेचिश के कीटाणु की मांग होती तो कभी हैजा के कीटाणु की, मौसम बदलते ही कीटाणुओं की मांग बदल जाया करती थी।
ऐसे ही एक दिन ईल्लीकी मां कीटाणुओं के ट्रक लादकर व्यापार करने गई। पीछे से ईल्ली को नानी का तार मिला।
‘‘फटाफट चली आओ, यहां बहुत वर्षा हुई है। गढ्ढे पोखर पानी से भरे हुए है। काफी कीटाणु बिकने की संभावना है। डाईरिया के कीटाणु अधिक लाना।’’
‘ओइ! मां तो अभी तक लौटी नहीं, अब उनकी जगह मुझे ही जाना होगा। अच्छे बच्चो की तरह मुझे बड़ों के काम में हाथ बटांना चाहिए।’ यह सोच नन्ही ईल्ली ने ट्रक लादने शुरू किये। तरह-तरह के कीटाणुओं को लेकर वह चल पड़ी सौरपुर शहर की ओर।
रास्ते में कीटाणुओं से भरे ट्रक देखकर दवाई ने हमला कर दिया।
चारों ओर से घेर कर दवाई अपने गोली-केप्सूल दागने लगी। परन्तु कई कीटाणु थे बड़े होशियार उन्होंने अपने बीजों को कड़े खोल के आवरण में सुरक्षित रख छोड़ा था। हमले में काफी कीटाणु मारे गये। ईल्ली स्वंय भी किसी तरह बचती बचाती रास्ते की कठिनाईयों को पार करती हुई नानी के घर पहुंची।
नानी ईल्ली से मिलकर और ईल्ली नानी से मिलकर बहुत खुश हुई, नानी ने ईल्ली को गले लगाया। उन्होंने एक दूसरे के हालचाल पूछे व धूप भी सेंकी और अपने पंख भी झाड़े उनके बीच नये कीटाणु की चर्चा भी चली।
नानी ने ईल्ली से कहा, ‘‘आज से हम कीटाणु पहुंचाने का काम शुरू करेंगी। इससे पहले मैं चाहती हूं कि तुम घूमकर पूरे क्षेत्र का मुआयना कर लो ताकि सोच समझकर कार्य पूरी कुशलता से कर सको। क्योंकि अभी तुम एक बच्ची मक्खी हो। व्यापार की तकनीक से अपरिचित हो अत: साथ रहकर मैं तुमहें इस कला की बारीकियां समझाऊंगी।
कहने को तो यह सौरपुर शहर है यहां की नगरपालिका खूंखार है किन्तु डरने की कोई बात नहीं मैं तुमहारे साथ रहूंगी। ‘‘इतना कहकर नानी ने उड़ान भरी। साथ में ईल्ली ने भी उडान भरी।
उन्होंने उन तमाम जगहों को देखना शुरू किया जहां-जहां उनके माल अर्थात~ कीटाणुओं को अधिक मात्रा में बेचा जा सकता था।
‘‘यह देखो ईल्ली, मिठाई की दुकाने’’
‘‘हां मैं देख रही हूं नानी। मुझे मीठा बहत पसंद है।’’
ईल्ली की भोली शक्ल और मासूम जवाब सुन नानी मुस्कुरायी, ‘‘यहां कीटाणु खपत की काफी संभावना है। यह देखो ईल्ली रेलवे प्लेटफार्म, बस स्टेण्ड और इनसे लगी दुकाने शहर की अच्छी जगह है जहां भीड़ भाड़ रहती है.....’’
‘‘यह कहां आ गये हम?’’
‘‘ईल्ली हम अस्पताल आये हैं।’’
‘‘बाप रे! अस्पताल, चलो भागो नानी।’’
‘‘नहीं-नहीं डरो मत ईल्ली। कहने को यह अस्पताल है पर देख नही रही हो इसके चारों ओर बिखरे मलबे का ढ़ेर, बदबूदार शैचालय, यहां भी कीटाणु पहुंचाने की काफी गुंजाईश है। हां, कभी-कभी खतरा भी रहता है परन्तु जोखिम उठाना अपने धंधे का गुण है।’’
‘‘सो तो है नानी’’ ईल्ली बोली और वे आगे उड़ चली।
‘‘यह कौन सी जगह है नानी?’’
‘‘यह एक विद्यालय है। इसमें बच्चे पढ़ते है। वैसे यहां माल, मेरा मतलब कीटाणुओं की खपत की उम्मीद कम हैं फिर भी मैंने अपने कई गुप्तचर यहां छोड़ रखे है जब भी मौका मिला तो हम हाथ से नहीं जाने देंगी।’’
‘‘वाह! बन्दोबस्त तो बहुत अच्छा कर रखा है नानी तुमने परन्तु यहां इतनी सफाई क्यों है?’’
‘‘क्योंकि यहां के बच्चे श्रमदान करते है। स्कूल साफ सुथरा रखते है और रहते भी साफ सुथरे हैं।’’
‘‘फिर तो यहां कीटाणु पहुंचाने का काम बहुत मुश्किल है।’’
कुछ देर नानी और इल्ली उड़ती रही फिर एक जगह पहुंची।
‘‘यहां कहां ले आयी नानी!’’
‘‘ईल्ली यह सौरपुर शहर के किनारे लगी कच्ची बस्ती है, अरे यहीं तो वह खास जगह है।’’
‘‘खास जगह!’’
‘‘हां तुम खुद देखोगी तो समझ जाओगी। देखो बारिश के कारण ही नहीं बल्कि नालियों के अभाव में घरों का गंदा पानी सब जगह बिखरा पड़ा है। पसंद आया तुम्हें यह कीचड़?’’
‘‘पर नानी यहां के लोग!’’
‘‘तुम चिन्ता मत करो। यहां के लोगों को मजदूरी से ही फुर्सत नहीं’’
‘‘फिर भी नानी साफ सुथरे तो रहते होंगे।’’
ईल्ली की बात सुनकर नानी हंसी। ‘‘नहीं, ये कई दिनों तक नहाते नहीं। देख नहीं रही हो इसके खुले फोड़े फुंसी हमें खुला निमंत्रण दे रहे है। इच्छा हो रही हो तो जरा बैठकर देख लो।’’
कुछ देर दौनों वहां भिनभिनाती रही। थोड़ी देर बाद ईल्ली बोली, नानी मेरा पेट भर गया है, चलो अब आगे चलते हैं।’’
‘‘हां चलो।’’
और दोनो उड़ चली।
‘‘अब हम कहां आ पहुंचे नानी?’’
‘‘कहने को तो यह शहर पर्यटन स्थल है बिटिया। दूर-दूर से सैलानी यहां घूमने आते है। यहां के लौगो को भी घूमने का बहुत शौक है। बाहर का खाना भी बहुत पसंद करते है।
रविवार को तो यहां मेला लगा रहता है। इतनी भीड़ पड़ती है कि पूछो मत, सच ईल्ली! सजे धजे लोग पर बैठने का आनंद ही कुछ और है। और वहीं समय रहता है खास स दिन हमारे कार्य व्यापार का’’ हा! हा! हा! नानी रहस्यमयी हंसी हंसने लगी। फिर बोली-
‘‘इतना भीड़ भड़का। किसे फुर्सत जो ध्यान दे। सभी को जल्दी। उस दिन ठेले वाले के हाथ जल्दी जल्दी चलते है। मुझे तो लगता है जैसे हाथ नहीं मशीन हो। बस फटाफट फटाफट। सारी खाने की वस्तुऐं खुली रहती है। बस तभी हमें चुपके से अपना काम करना होता है। इतने कीटाणु बिक जाते है ईल्ली कि धन्धा करने का मजा आ जाता है।’’
‘‘मेरा अनुमान है कि कच्ची बस्ती से अधिक माल यहां बिकेगा। टाईफाईड के कीटाणु तो यहां हाथों हाथ बिक जायेंगे।’’
‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं बिटिया। आखिर तुम हो बड़ी समझदार मेरी औलाद जो ठहरी। चलों, वहां चलते है।’’ दोनों आगे बढ़ी।
‘‘ये वह जगह है ईल्ली जहां सब झूठन का कचरा फेंका जाता है।’’
‘‘बाप रे बाप ये तो पूरा पहाड़ बन गया है।’’
और हां, इसकी बदबू में हमारे कीटाणु बड़े आसानी से खुश होकर रहेंगे। तपेदिक के कीटाणुओं को तो मजा आ जायेगा। तुम तो अपने सारे ट्रक खाली कर यहीं गोदाम बना लेना क्योंकि महीनों यह कचरा नहीं उठने वाला।