सोमवार, 17 दिसंबर 2012

कारगिल की घाटी : 1

‘‘प्लीज शान्त हो जाओ एक और अच्छी खबर है मेरे पास।’’
‘‘क्या.....? क्या....?’’
‘‘हमारी कक्षा को परेड प्रदर्शन के बाद गीत गाने का मौका मिलेगा। उसकी सभी को तैयारी करनी होगी।’’
‘‘अजी कमाल हो गया .... मोनीटरजी इस बार तो तूसी रिपोर्ट बड़ी जानदार है।’’ जसविन्दर जोर से चिल्लाई तो हरप्रीत ने मुंह में अंगुली डाल जोर से सीटी बजा दी। ‘‘कौन सा गीत है मोनीटरजी? हम भी तो सुने।’’
‘‘बताती हूं।’’ कहती हुई अनन्या क्लासरूम के मंच पर चढ़ गई। मेडम की खाली टेबुल कुर्सी के पास जाकर खड़ी हो गई ओर फिर कहने लगी- किस किस को याद है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा.....।’’
अनन्या के इतना कहने भर की देर थी। कई लड़किया हाथ उठाए मंच की ओर दौड़ पड़ी- हमें आता है.....हमें पूरा याद है....
एक एककर लड़कियों का पूरा झुंड कक्षा मंच पर पहुंच गया। सभी गाने लगी-
सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा, हमारा
हम बुलबुले है इसके ये गुलसिता हमारा...हमारा...
‘‘प्लीज लड़कियों इतना बेसुरा मत गाओ कि गीत ही शर्मा जाय।’’ अनन्या कान के पर्दे बंद करती हुई चीखी। पर उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था। पूरी कक्षा में गीत के शब्द बेसुरे होकर शोर पैदा करने लगे-
पर्वत वो सबसे ऊंचा.....गोदी में खेलती है जिसके हजारों नदिया....हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्ता हमारा...सारे जहां से अच्छा... शोर बढ़ने लगा तो अनन्या ने बढ़कर कक्षा के दरवाजे खिड़की बन्द करने लगी। ताकि शोर बाहर न जाय। उसका कक्षा को संभालना मुश्किल होता जा रहा था। लगभग दस मिनिट तक यही सब शोर शराबा चलता रहा। इसके बाद दीप्ति के पांव पर किसी का पैर लग गया। उई मां! दीप्ति चीख उठी- बदतमीज कहीं की....। उसने एक तमाचा शकीला के मुंह पर जड़ दिया। यह देख बानो ने दीप्ति को धक्का दे दिया। दीप्ति पीछे की लड़कियो से जा टकराई। किसी के सिर की ठोडी ठुकी तो किसी के होठ दांत में घुस गये।
‘‘अरे ये क्या धक्का मुक्की हो रही है?’’

कारगिल की घाटी : 15 अगस्त 2012







                       खाली पीरियड


‘‘ओऐं लड़कियों ऽ ऽ सब चुप हो जाओ....क्लास गल्र्स.....प्लीज.....शट योर माऊथ...’’कक्षा की मोनीटर अनन्या ने दरवाजे के भीतर घुसते हुए कहा। अनन्या की आवाज सुन खुसुर-पुसर करती, बतियाती, शोर करती सब लड़किया शान्त हो गई।
अनन्या अभी स्टाॅफरूम से लौटी थी। वह अध्यापिका का संदेश देने लगी-
‘‘सब सुनो, आज कमलेश मेडम क्लास नहीं लेगी.....स्टाॅफरूम में 15 अगस्त की तैयारी को लेकर मंत्रणा चल रही है। इस बार हमारे विद्यालय को स्टेडियम परेड के  दौरान अग्रिम पंक्ति में रहने का मौका मिला है। सबसे पहले हमारे स्कूल का ट्रूप होगा हमारे स्कूल का झंडा लिए....’’
हिप .... हिप... हुर्रे..... सभी लड़किया एक साथ उछल पड़ी।
‘‘सुनो सुनो ऽ’’ ताली बजाती मोनीटर ने मुंह पर अंगुली रखकर सबको चुप रहने का संकेत किया।
‘‘सब चुप हो जाओ......संभावना है कि परेड ट्रूप का कमांडर भी हमारे विद्यालय से चुना जाय शायद इसीलिए.......’’
‘‘क्या कोई लड़की बनेगी ट्रूप कमांडर.....हुर्रे....’’ सभी लड़किया एक साथ उछल पड़ी। ‘‘सुनो....सुनो...सुनो......’’ताली बजाती हुई मोनीटर ने मुंह पर अंगुली रखकर सबको चुप होने का संकेत किया। ‘‘सब चुप हो जाओ प्लीज...। परेड ट्रूप का कमांडर भी हमारे विद्यालय से चुना जाना तय है शायद इसीलिए.... ’’टेबिल थपथपाने की आवाज गूंजने लगी।
‘‘चयन के लिए सभी अध्यापिकाएं लड़कियों के नाम प्रस्तावित करके सूची बना रही है जो प्रधानाध्यापिकाजी को दी जायेगी। फिर वे किसी एक को चुनेगी।’’
‘‘वाह जी वाह! वाह....जी....वाह........कौन होगी वह मिस भाग्यशाली?.....हमारे स्कूल की ब्रांड एमबेसेडर?’’

बुधवार, 20 जुलाई 2011

घड़ी जब ग्यारह बजा रही थी। तो दलीचंद सामने था। नहाया हुआ। साफसुथरा। बालों में कंघी किये हुए दमकता हुआ मानो बरखा के बाद धूप खिली हो।
‘‘आ गये तुम!’’ मुस्कान से उसका स्वागत करते हुए मैंने कहां। प्रत्युक्तर में उसने गर्दन हिला दी।
‘‘पढ़ोगे?’’ मैं आश्वस्त होना चाहती थी। उसने दुबारा ‘हां’ में गर्दन हिला दी।
ठीक है मैंने मेज की ड्रावर खोलते हुए एक नई काॅपी पेन्सिल निकाली। शाम को ही उसके लिए खरीद कर लायी थी। काॅपी पेन्सिल उसकी ओर बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहती थी तभी ख्याल आया काॅपी पर इसका नाम तो लिख दूं।
‘‘तुम्हारा नाम लिख देती हूं।’’
नुकीली पेसिंल से मैंने उसका नाम सुन्दर अक्षरों में लिख दिया। अंग्रेजी लिपि में DLICHAND । वह देख रहा था। उसकी नजरे कौतुकी थी। मैंने महसूस किया कि उसे अच्छा लग रहा है। पहला पेज खोल उस पर कुछ आड़ी, तिरछी व सीधी रेखाएं खींचते हुए मैंने उसे समझाया -
‘‘ये देखो - ये सीधी, ये आड़ी और ये तिरछी रेखा है। इसे तुम भी बनाओ। यहां बैठकर।’’ पास की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा।
उसने काॅपी पेसिंल उठाई और उसे देखने लगा। मैंने उसे बैठने और रेखाएं खींचने के लिए फिर से कहा और अपने काम में लग गई।
मेरे सामने कागज फैले पड़े थे। गाढ़े पीले नीले रंगों को उठाया और अपने काम में मशगूल हो गई। मेरे हाथ से तेज मेरा दिमाग दौड़ रहा था। रंग आकृतियां बनाने लगे। धीरे धीरे एक पूरा आकार बनकर तैयार हो चुका था। मेरी एकाग्रता भंग हुई तो पास बैठे दलीचंद पर निगाह गई। वह मुझे व मेरे काम को देख रहा था अपलक। उसकी काॅपी में केवल एक सीधी रेखा खींची हुई थी।
‘‘अब तक केवल इतना ही किया...? देखो मैंने तो अपना पूरा एक काम कर लिया।’’ अपना काम उसे दिखाते हुए मैंने कहा।
‘ये क्या है?’ उसने रंगो की ओर इशारा करते हुए पूछा।
‘‘कलर्स है। तुम्हें चाहिये?’’
मैंने देख रही थी कि वह ललचायी नजर से उन्हें देख रहा था। मेरे पूछने पर उसने हां तो नहीं की पर उसके चेहरे पर खुशी का भाव था। मैंने उसे लाल रंग की पेंसिल थमाते हुए कहा - ‘‘लो इससे बनाओ सारी सीधी रेखा।’’
उसने पेंसिंल ले ली। अपनी पतली अंगुलियों के बीच पेंसिल फंसाये वह रेखा खींचने लगा। लगभग दो मिनिट से भी कम समय में उसने सारी सीधी रेखाएं खींच दी थी।
‘‘वाह! खूब। अब ये नीले रंग की पेंसिल लो। सारी आड़ी रेखाएं इससे बना दो।’’ रंग भरी पेसिंल पकड़ते हुए उसमें उत्साह समा गया और उसने फटाफट अपने काम को अंजाम दे दिया। अब बारी हरे रंग की तिरछी रेखाओं की थी। मुझे कुछ कहना नहीं पड़ा। दलीचंद के हाथ फुर्ती से बात पकड़ रहे थे। उसकी बुद्धी पर मुझे संतोष हुआ।
‘‘तुम शीघ्र ही अक्षर सीख लोगो। होशियार हो।’’ अगले पेज पर मैंने अंग्रेजी लिपि का ‘ए’ बनाकर उसे समझाया। ए को मैंने तीनो ही रंगों से डिजाईन किया। कुछ समय लगा पर दलीचंद की गाड़ी दौड़ पड़ी रंगों की डगर पर अक्षरों की सवारी लिए हुए।
यह एक अखबार का कार्यालय था जहां मैं विज्ञापन विभाग में काम करती थी। कई विज्ञापन हर रोज के आते थे। उन्हें सेट करना, डिजाईन करना, रंग,भाषा और लिपि देखने संबंधित कई कामों को गहराई से देखना परखना और जांच करना पड़ता था। पसंद नहीं आने पर नये लुक देना रोज पानी खोजने जैसा दुरूह कार्य काम है। परन्तु मेरी दिलचस्पी शुरू से ही सजृन और कला में रही है तो मैं यह काम बखूबी कर लेती थी।
यह मैं जिस समय की बात कर रही हूं उस समय कम्प्यूटर का इतना चलन नहीं था। ज्यादातर काम प्रिंटिग के पारम्परिक तरीको से होता था। अतः मशीनो के बजाय मानव श्रम से काम पूरे किये जाते थे। आज तो अत्याधुनिक छपाई मशीने आ गई है। डिजाईन का अधिकांश कार्य भी कम्प्यूटर के एक कमांड द्वारा सम्पन्न हो जाता है।
उस समय मुझ जैसे सृजन क्षमता वाले डिजाईनर कम ही हुआ करते थे। मैं अपने काम में भरपूर नये प्रयोग करती थी। यहां सभी मेरे काम से खुश थे। थोड़े ही दिनों में मैंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली। उस दिन दलीचंद जब मुझे पूछता हुआ कार्यालय आया था तो चपरासी ने उसे मुझ तक पहुंचा दिया था।
चपरासी चाय ले आया।
‘‘चाय पीओगे?’’ मैंने दलीचंद से पूछा। उसने जवाब नहीं दिया। जिसे मेंने हां समझा। उसके लिए भी चाय मंगवा ली। चाय खत्म होने के बाद मैंने पेंसिल उठाई और अगले पेज पर गोला बना दिया। गोला बनाकर काॅपी दलीचंद की ओर बढ़ा दी।
तभी सूचना आयी, ऋषभ सर बुला रहे है। वे यहां सब एडीटर अर्थात उपसंपादक है। अखबार का ले-आऊट वे ही तैयार करते है। मेरे द्वारा तैयार विज्ञापन के एप्रूव करने का जिम्मा भी उन्ही का था। मैंने संबंधित फाईल अपनी टेबिल से उठाई और सर के पास चली गई।
मैं जब वापस लौटी तो एक घंटा गुजर गया था। दलीचंद खिड़की पर खड़ा दौड़ती सड़क को निहार रहा था।
‘‘काम कर लिया?’’ मैंने उसकी काॅपी देखी। वह गोले से आधा पेज भर चुका था।
‘‘पूरा क्यों नहीं किया?’’ अभी तो तुम्हें हाफ सर्कल भी बनाना है।’’ वह मेरा मुंह देखने लगा।
‘‘कोई कठिनाई है?’’ बोला तो वह कुछ नहीं पर अनमना सा आकर फिर मेज के किनारे स्टूल पर बैठ गया। मेरे बताये अनुसार वह काम करता रहा। इस तरह उसने अंग्रेजी के तीन अक्षर ए बी और सी सीख लिया।
लंच का समय होने वाला था। इसे भी भूख लगी होगी। ‘‘टिफन लाये हो अपना?’’ वह हां में शर्माता हुआ मुस्कुराया।
‘‘खा लो।’’
मेरे कहने पर उसने अपने निकर की जेब में हाथ डाल कपड़े की पोटली निकाल ली। मैं देख रही थी-

बेसब्री से पोटली का खोलना।
लुकी बाटी का निकालना।
चटनी के साथ कौर का चबाना।
क्षुधा शान्ति भाव का पसरना।
लौटा भर पानी का पीना
तृप्त होकर डकार का लेना।
चेहरे पर सन्तुष्टि का तैरना।

‘‘अब तुम्हारी छुट्टी।

शुक्रवार, 28 मई 2010

उसने कहीं दूर किसी ओवर फ्लाई की ओर इशारा करते बताया कि उसकी छाया में झोपड़ी तान रखी है। वह अपने घर गांव के बारे में बताने लगी-


पहले जब वह छोटी थी तब इस महानगर से सटे गांव में रहती थी। बहुत छोटी थी तब ही उसकी मां गुजर गई। पिता ने उसकी शादी दल्ला के पिता से करा दी। शादी के समय उसकी उम्र नौ-दस साल थी। शादी के बाद काम की तलाश उन्हें इस महानगर में खींच लायी। गांव में खेती जमीन थी। पर सारी जमीन महाजन खा गया। पैसा लिया था उससे खेत गिरवी रखकर। जब खेत न रहे तो वह इस महानगर में चले आये। बहुत भटके। फाके भी रहे। पर धीरे धीरे गुजारा होने लगा। कभी आधे पेट भोजन मिला तो कभी दूसरो के आगे हाथ भी फैलाना पड़ा। तीन बच्चों में दल्ला सबसे छोटा है मेडमजी, चाहूं कि यह पढ़लिख जाय।
- चाहती हो तो पढ़ने भेज दो।
-आप ही कहीं कोशिश करो। ये स्कूल जाने लगे तो मैं आपका बड़ा अहसान मानूं दीदीजी।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू आंखों से लगाते हुए कहा।
-इसकी उम्र कितनी है?
-ग्यारह बारह का हो गया होगा।
-अक्षर वगैरह लिख लेता है?
दल्लू · ऐ! दल्लू · · मां ने पुकारा तो दल्ला झूला छोड़ इधर चला आया।
-हाथ जोड़ मेडमजी को।
मां के कहने पर उसने अभिवादन किया। बता मेडमजी क्या पूछे है? जो पूछे उसका जवाब दे।
‘‘अक्षर वगैर लिख लेते हो?’’ मैंने प्रश्न दोहराया। वह मुंह ताकता कुछ देर खड़ा रहा। फिर ‘ना’ में गर्दन हिला दी।
ए.बी.सी.डी...एक दो तीन चार कुछ तो आता होगा। मेरे पूछने पर उसकी गर्दन फिर ना में हिल गई।
ओह! मेरे मुंह से निकल पड़ा। मैं सोच में पड़ गई । इसकी उम्र इतनी छोटी भी नहीं की इसे कहीं पहली क्लास में दाखिला मिले। मुझे सोचता देख वह बोल उठी -
‘‘मेडमजी आपका बड़ा उपकार होगा। यह थोड़ा पढ़लिख जाय तो कम से कम इंसान बन जायेगा। इसके बाप के साथ हमारा जीवन भी कूड़ा उठाते गुजर गया पर ये तो... ये काम ना करें। पर पढ़ेगा तो ही छुटकारा होगा।’’
‘‘बात तो तुम्हारी ठीक है पढ़ेगा तो ही सच्चे मायने में इंसान बनेगा।
‘‘पढ़ाई कर ले तो कहीं बही खाता लिखने का काम मिल सके है मेडमजी?’’ उसने आशा से मुझे देखा।
‘‘हां हां क्यों नहीं। पढ़ेगा तो बही खाता लिखने का क्या इससे भी ऊंचा काम कर सके है।’’
‘‘बस यहीं चाहू हूं मेडमजी। जरा लायक आदमी बन जाय। पहली दो तो लड़कियां थी सो चल गया। नहीं पढ़ी तो भी शादी कर दी और वो ससुराल चली गई। पर ये तो लड़का है। पढ़ेगा तो....कहीं अच्छे से काम करने लगे....।
‘‘वो तो ठीक है दल्ला की मां....’’
‘‘मेडम जी हूं तो लच्छू की घरवाली, पर जिसे देखो वहीं मुझे दल्ले की मां कहकर ही पुकारे है।’’ अपने बेटे को प्यार से सहलाते वह गर्वित भाव से बोली। मैं भी हैरान हुई उसे देखती रह गई। पहचान भी दे रही है पर अपने नाम से नहीं। मेरी तंद्रा भंग करते हुए वह बोली-
‘‘इसके बाप को भी बड़ा चाव है दल्ला पढ़े। उसने तो एक साहब से भी बात की इसके लिए। वो इसे पेट्रोल पम्प पर नौकरी लगवा देगा। बस थोड़ा हिसाब किताब करना सीख लो तो मेरा दल्ला पम्प पे काम करा करें। टोपी और वर्दी में सजा हुआ।
मैं देखा कोई स्वप्न संसार उसकी आंखों में फैलता हुआ चेहरे पर पसर गया। आशा भरा सुख उसकी आवाज में घुल आया।
‘‘मेडमजी...’’
‘‘ठीक है।’’ मैंने स्वीकारा। दल्ला को मैं पढ़ाऊंगी।’’
वो खिल उठी। दल्ला पास में खड़ा इस सबसे बेखर उदासीन सा इधर उधर ताक रहा था। कॉम्पलेक्स की आवाजाही बढ़ गई थी। मैंने घड़ी पर नजर डाली। पूरा एक घंटा व्यतीत हो चुका था। मैंने उठते हुए कहा-
‘‘ उधर आश्रम रोड के उस पार मेरा ऑफीस है। दल्ला को वहां भेज देना। मैं उसे पढ़ाऊंगी। पहले थोड़ा अक्षरज्ञान हो जाये फिर उसके स्कूल की बात तय होगी। इस उम्र में अब उसे कोई भी पहली क्लास में लेने को तैयार नहीं होगा। पहले उसे कुछ पढ़ना लिखना सीखना होगा। उसने भी स्वीकार लिया कि वह कल से उसे मेरे पास भेज देगी पढ़ने के लिए।
‘‘हां जरा साफ सुथरा आना पढ़ने के लिए। नहाकर- मैंने उसे हिदायत दी। कॉपी पेंसिल किताब तो मैं ला दूंगी।’’ कहकर मैं चलने को हुई। वह बहुत खुश थी। मेरे पीछे-पीछे मेरा अनुसरण करने लगी।
‘‘कल बारह बजे।’’ मैंने कहां। ‘‘और हां अब से दल्ला नहीं इसका नाम होगा- ‘‘दलीचंद’’।
एक सपना जो अभी दल्ले की मां की आंखों में तैर रहा था। उसका एक रेशा मेरी आंखों में भी समा गया। ‘एक अच्छा काम। एक नेक काम होगा मुझसे। अगर इसे पढ़ा सकी तो एक जीवन संवर जायेगा।’ आनंद से भरा मन खुशी देने लगा। इस स्वपनजाल को लिए मैं लिफ्ट में बंद हो ऊपर चली आयी ।

अगली पोस्ट में - रंगो के साथी

शुक्रवार, 7 मई 2010

दलीचन्द

मुझे समझ नहीं आया था ये ‘बाड़ू’ क्या होता है? पहले पहल तो मैंने मना कर दिया। फिर उनके हाथ में भोजन के लिए बर्तन देख और कुछ दूसरे फ्लैट से भोजन लेते देख सहज अनुमान लगाया कि यह खाना मांग रहे है। मैंने देखा कोई बचा हुआ तो कोई सुबह का बना बासी खाना उनके बर्तनों में डाल रहे है। मैं भी उनके बर्तनों में खाना उलटने लगी थी। जैसा कि दूसरे फ्लैट वाले कर रहे थे। पर ऐसा करने पर मन में एक अजीब सा असंतोष होता-
‘दूसरो का कूड़ा ढ़ोओ, बुहारो, गन्दे रहो और भोजन बासी पाओ।’ मेरा मन अजीब सी दुविधा से घिर आता। ‘मैं दिया करूंगी ताजा खाना। शाम को थोड़ा खाना ज्यादा बना लिया करूंगी। थोड़ा उनके लिए भी बनाऊंगी। ये भी गर्म खाने का स्वाद चखे।’
द्वार की घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला। देखा वहीं मां बेटे। वही बर्तन। वहीं बाडू की पुकार। मैं जैसे इसी इंतजार में बैठी थी। गई और फटाफट खाना ले आई। क्योंकि मैंने बनाया था थोड़ा अधिक। अलग से निकाल भी था उनके लिए। मैं गर्म खाना ले आयी तो उसने बर्तन आगे बढ़ा दिया। बर्तन में पहले से खाना भरा हुआ था। मेरे हाथ रूक गये -
‘‘क्या दूसरा बर्तन नहीं है तुम्हारे पास। यह गर्म खाना है।’’ पहली बार उनसे संवाद स्थापित करते हुए मैंने कहा। वो कुछ अचकचाया। उसकी मां बोली - ‘‘दीदी इसी में डाल दीजिये।’’
‘‘कल दूसरा बर्तन ले आना गर्म खाने के लिए।’’ मैंने उसे हिदायत देते हुए कहा।
दूसरी शाम वह फिर आये थे बाडू लेने। नित्यकर्म की भांति। अलग बर्तन तो नहीं थे उनके पास। दल्ला ने जेब से मुड़ी-तुड़ी पॉलीथीन थैली निकाली। वह उसे आगे बढ़ाकर बोला - ‘‘मासी गर्म खाना इसमें डाल दीजिये।’’
‘‘ओह! थैली। पॉलीथीन तो नुक्सान करता है।’’
वह चुप। मुझे उपाय सूझा।
‘‘ठहरो’’ मुझे याद आया मेरे पास पुराना टिफिन है। मैंने उसमें भर कर खाना दे दिया। उसके चेहरे पर खुशी के भाव देख मेरा मन प्रसन्नता से भर आया।
अब जब भी मैं काम पर जा रही होती या किसी काम से वापस लौट रही होती उनसे नजरे मिल जाती तो दोनों मां बेटे मुस्कुरा उठते। आते जाते नमस्ते भी करने लगे। मुझे भी अच्छा लगता। अपरिचय के केन्द्र में एक छोटासा परिचय। इस विशाल कॉम्पलेक्स में कोई तो है जो मुझे पहचान रहा है। कितना अजनबीपन पसरा हुआ है यहां।
ये महानगर की अपनी जीवनशैली है शायद। मैं किसी को आपस में बात करते हुए नहीं देखती। सब अपने हाल में मस्त। अपने हिसाब से व्यस्त। कोई किसी से कुछ नहीं पूछता। कोई कुछ नहीं कहता। बस चारों ओर लोगो की भीड़। हजूम का हजूम है। या फिर रेला है। कहां से आ रहा है और कहा समाता जा रहा है। मरूधरा के रेतीले धोरे की तरह। बस फर्क इतना कि वहा बालू है और यहां मानव। इस भीड़ में यह अकेलापन और अजनबीपन। कभी-कभी मन में डर या झिझक भी पैदा करता।
मैं एक कस्बाई क्षेत्र से हूं। जहां का माहौल यहां से बिल्कुल परे है। वहां हर कोई हर किसी को पहचानता है। रास्ते में मिल जाने पर अभिवादन के साथ लगे हाथ कुशलक्षेम भी पूछ ली जाती है। वहां भी लोग मंदिर जाते है और यहां भी। कितना अंदर है यहां और वहां के परिवेश में। वहां के मंदिर पूजा अर्चना और आध्यात्म के साथ सूचना आदान प्रदान के केन्द्र होते है। जहां तमाम प्रकार की सूचना मिल जाती है। जन्म, मृत्यु और परिणय की। कहां किसके यहां जन्म हुआ है और किसकी मौत हुई। किसका विवाह है और किसका संबंध तय हुआ है। बड़ी बातांे से लकर छोटी मोटी बातों तक। पशु पक्षी से लेकर पेड़ पौधे तक। बस्ती वालों से लेकर पूरे नगर तक। अमीर से लेकर गरीब तक। हर किसी को हर किसी में दिलचस्पी कहीं कोई बेगाना नहीं।
ये महानगर कैसे बसे होंगे? गांव-नगर के लोगों ने ही तो मिलकर बसाया होगा इसे। बाद में देश के कोने कोने से आये होंगे रोजी रोटी की तलाश में। और फिर सब यहीं बस गये। विभिन्न समुदाय, भिन्न खानपीन, वेशभूषा, भाषा और संस्Ñति। आचार-विचार सबकुछ अलग-थलग। कितना दिलचस्प है।
मैं सोचती - ‘एक दूसरे के बारे में जानने की कितनी उत्सुकता होती होगी। मेरे कस्बे में तो यहीं होता है। कोई भी नया व्यक्ति आ जाय। पंचायत आ जुड़ती है। उसे कभी अनजानापन तो लगता ही नहीं। देर सवेर वे उसे अपना बना ही लेंगे।’
जब से मैं यहां आयी हूं मेरी कस्बाई सोच और यहां यह महानगर, दोनों में घमासान मचा रहता।
छुट्टी का दिन था। मुझे ऑफीस नहीं जाना था। देर से उठी तो सारे काम ही देर से शुरू हुए। चाय के कप के साथ ताजा अखबार लिए मैं बालकनी में आ बैठी। बालकनी से नीचे गार्डन की ओर नजर गई। देखा, दल्ला झूला झूल रहा था। कॉम्पलेक्स में यह बच्चों का गार्डन था। जिसका पूरा परिदृश्य मेरी बालकनी से नजर आता था। गार्डन में झूले के साथ कई चढ़ने-उतरने-फिसलने व संतुलन साधने जैसे खेल उपकरण लगे हुए थे। इन्हें देख मुझे अपना बचपन याद हो आता। मेरी चाय खत्म हो चुकी थी और अखबार भी मैं टटोल चुकी थी। इच्छा हुई नीचे गार्डन में जाऊं। वहां कुनकुनी धूप खिली हुई थी। गुलाबी ठण्ड में सुबह की धूप का आनंद लेने के लिए मैंने फ्लैट को लॉक किया और लिफ्ट से नीचे चली आयी।
देखा दल्ला अब फिसलपट्टी पर चढ़ा हुआ था। फिसलने के लिए। उसकी मां परिसर बुहार रही थी। सामने लगी गार्डन की बेंच पर मैं जाकर बैठ गई। पूरा परिसर शान्त छुट्टीमय था। हर रोज की हलचल इन लम्बे टॉवरों में दुबकी निद्रामग्न थी। मैंने दृष्टि घुमाई, चारों ओर ऊंचे ऊंचे टॉवर। जिनमें अनगिनत फ्लैट। फ्लैट में कितनी बालकनी और बालकनी में सूखते टंगे हुए असंख्य कपड़े।
‘कितने लोग रहते होंगे यहां? कितने परिवार होंगे? कितने बच्चे होंगे? एक के बाद एक प्रश्न कौंध रहे थे मन में। इस पूरे कॉम्पलेक्स में तो मेरा पूरा गांव समा जाय। क्या हो जब वे सब एक जगह, एक छत के नीचे हो तो ? आपस में बतियाने में शायद खानापीना ही भूल जाय। तंद्रा में खोये हुए कई विचार आ जा रहे थे।
‘‘नमस्ते मेडमजी। कैसी है?’’
‘‘अच्छी हूं।’’
बात का सिलसिला खत्म हो चुका होता अगर वह वहां मेरे पास आकर दूब पर नहीं बैठ गई होती।
‘‘कहां रहती हो?‘‘ मैंने बात के क्रम को आगे बढ़ाया।
-शेष अगली पोस्ट में

बुधवार, 5 मई 2010

उड़ान


महानगर


---ये हैं हमारे महानगर। जिसकी गोद में उग आया है कंक्रीट का समंदर। विशालकाय इमारते और उनमें जगमगाती रोशनी का भंवर। किसी स्वप्नलोक की भांति खींचती है आदमी को। अपने अंदर असीम आर्कषण शक्ति लिए है ये महानगर। जो भी अपने सपने लेकर यहां आया है उसने पाये है।
---भागती दौड़ती जिन्दगी यहां की न रूकती है न कभी थकती और न ही कभी ठहर कर देखती है। लक्ष्मी पुत्रों की रमणीय स्थली बने ये महानगर दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ते जा रहे है। गांव, नगर, कस्बे सबकुछ इसमें समाहित होते जा रहे है।
---हमारा बहुत कुछ बदल कर रख दिया है इन महानगरों ने। आदमी, आदमी ना रहा गोया मशीन का पुर्जा हो गया। शोर और रफ्तार के बीच दम तोड़ता बचपन आज भी यहां का शा्श्वत सत्य है। बचपन रीतता गया और तरूणाई लुट गई। कभी न खत्म होने वाली यह दास्तान महानगर की छाती पर पड़े फफोले की भांति आज भी दर्द से टीसती है।
---अगर सत्य कहीं छिपा है इस महानगर में तो ठीक उसी तरह, जिस तरह नारियल के खोल के भीतर का पानी। आज भी.....उसी तरह.....जिस तरह.....बचा है आदमी के आंख का पानी। कहीं अनकहीं, गढ़ीं अनगढ़ीं दास्ताओं के बीच की है ये कहानी -



बरसों पहले की बात है- मैं साबरमती नदी के किनारे बने ‘सुपर कॉम्पलेक्स’ के ‘जी’ ब्लॉक में रहती थी।
अभी मैं यहां नई-नई थी। अड़ौस पड़ौस किसी को इतना पहचानती नहीं थी। अपने पास वाले फ्लैट में कौन रहता है? यह भी मुझे मालूम नहीं था।
ठीक सामने आश्रम रोड के उस पार मेरा ऑफीस था। ऑफीस पहुंचने के लिए मुझे नौ बजे घर से निकलना होता था।
जब मैं अपने फ्लैट को बंद कर रही होती तो अक्सर एक बच्चा अपनी मां के साथ कूड़ा उठाता नजर आ जाता। (उसे बच्चा कहना भी गलत होगा। वह किशोरवय पकड़ चुका था। बारह तेरह साल के आसपास उसकी उम्र होगी। और इस उम्र के बालक को किशोर कहते है)
उसकी मां उसे ‘दल्ला’ कहकर पुकारती थी। जब मैं ऑफीस जाने के लिए फ्लैट से निकल रही होती थी तब दल्ला कचरे का बड़ासा डिब्बा उठाये.....
उठाये कहना भी गलत होगा क्योंकि वह उसे सीढ़ियों से घसीटता हुआ नीचे उतारता था। घसीटने से पैदा होने वाला शोर बड़ा कर्कश और कान फोड़ू होता। और वह इस सबसे बेखबर हर सीढ़ी से डिब्बा कूदाता, घसीटता हर माले पर रूकता। जहां से डोर बेल बजा बजाकर हर फ्लैट का कचरा जमा करता जाता।
नाटे कद का, मैले कपड़े पहने स्याह वर्ण वाला दल्ला, कई दिनों का बिना नहाया हुआ अपनी मां के साथ काम में लगा हुआ नजर आता। उसकी मां भी उस जैसे गंदे और फटे वस्त्रों में कभी केम्पस के लम्बे चौड़े परिसर को बुहारती नजर आती थी। तो कभी कॉम्पलेक्स के बाहर बने ‘टी स्टॉल’ पर मां-बेटे चाय सुड़कते नजर आते। वे मुझे और मैं उन्हें पहचानने लगी थी।
अगली पोस्ट में दलीचन्द -

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

अण्डों की चोरी

गतांक से आगे -
ईल्ली के कीटाणुओं ने अपनी आबादी कई गुना बढ़ा ली थी। हर जगह उनकी कोलॉनियां बस चुकी थी। अपना फलता फूलता व्यापार देख नानी और ईल्ली बहुत खुश और संतुष्ट थी।
काम की अधिकता से नन्ही ईल्ली थक जाती थी। एक दिन जब वह थकी हुई आराम कुर्सी पर बैठी विश्राम कर रही थी तो उसे नानी ने याद दिलाया, ‘‘मेरे अण्डों का क्या हुआ ईल्ली’’ जाकर जरा देख तो आओ अब तक तो अण्डों से वयस्क मक्खियां बन चुकी होंगी। हमें भी अपने काम में मददगारों की आवश्यकता है।’’
‘‘हां नानी, ठीक याद दिलाया। अभी जाती हूं’’ कहती हुई ईल्ली ने गौशाला की ओर उड़ान भरी।
गौशाला में ईल्ली को एक भी मक्खी नजर नहीं आयी। उसे आश्चर्य हुआ। कि नानी के सौ-डेढ़ सौ अण्डों में से क्या एक भी मक्खी नहीं बन पायी। उसने अडौस-पड़ौस में पूछताछ शुरू करी साथी कीट पंतगों से पूछा तभी एक चींटे ने ईल्ली को बताया कि उसने कुछ दिन पूर्व दीमकों के तुंड सैनिको को देखा था जो बोरों में भर कर अण्डे ले जा रहे थे। हो सकता है वो अण्डे तुम्हारे ही हो। अजीब किस्म के जीव हो तुम अण्डे देने के बाद तुमने उन्हें संभाला तक नहीं चींटे ने बुरा सा मुंह बनाया और आगे बढ़ गया। नन्ही ईल्ली परेशान। उड़ती-दौड़ती चींटे के पास पहुंची-
‘‘चींटेराम, चींटेराम उन तुंड सैनिको का कुछ पता ठिकाना तो बता दो। हाय! कहां ले गये वो हमारे अण्डे।
‘‘तुम जैसी लापरवाह प्रजाति का यही हाल होता है।’’
‘‘नहीं-नहीं ऐसा मत कहो चींटेराम, कृपया मुझे दीमकों का पता बता दो। मैं उन्हें ढूंढ लूंगी।’’
‘‘वह दूर उस पेड़ पर उठे हुए टीले को देख रही हो न।’’ चींटे ने केवल इतना ही इशारा किया और आगे बढ़ गया। चींटा तो स्वभाव से ही मनमौजी था। किसी से अधिक बातचीत करना उसे पसन्द नहीं था।
नन्ही ईल्ली पेड़ के इर्द गिर्द भिनभिनाने लगी। ‘बाबा रे! यहां से वापस अण्डे लेना बहुत मुश्किल है। यह तो दीमकों का किला है। पूरा का पूरा भूमिगत, जमीन के नीचे गहराई तक फैला हुआ। जिसकी प्रत्येक सुरंग के द्वार पर रखवाली करते हुए बड़े सिर और बड़े शरीर वाले चौकन्ने पहरेदार। अब क्या किया जाय।’ वह सोचने लगी।
काफी देर सोचने के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं सूझा। निराश हो वह लौट पड़ी। मन की निराशा के कारण उसे थकान महसूस होने लगी वह सुस्ताने के लिए पेड़ के नीचे छाया में बैठ गयी।
परेशान ईल्ली गुनगुनाने लगी।
ओ प्रकृति की रानी
सुन ले मेरी कहानी
मैं हूं एक नन्ही मुन्नी
राह बहुत मुश्किल है
काम कठिन है
हिम्मत कम है
अब तू ही बता
कैसे खुश होगी मेरी नानी
तभी उसके स्वर में स्वर मिलाता उसे
बांसुरी का स्वर सुनायी दिया वह चौंक पड़ी, ‘‘कितना अदभुत स्वर है। कौन है यह बांसुरी वादक’’ ईल्ली ने देखा ऊपर पेड़ के पत्ते पर बैठा वही चींटराम बांसुरी की मधुर तान छेड़े हुए है।
ईल्ली की आंखे छलछला आयी। उसका गीत गाना बंद हो चुका था। उसे चुप देख चींटेराम ने भी बांसुरी बजानी बंद कर दी।
‘‘अण्डे मिले नन्ही मक्खी।’’
किन्तु ईल्ली मौन थी उसकी सिसकी नीरव वातावरण में गूंज उठी। उसकी पीली घेरदार पोशाक आंसुओं से भीग चुकी थी। उसका यह हाल देख चींटाराम को दया आ गई। वह पेड़ के पत्ते से नीचे उतर आया।
‘‘मैं जानता हूं तुम दीमक के किले तक नहीं पहुंच सकती आओ मेरे पीछे-पीछे आओ।’’ कहता हुआ चींटा बांसुरी बजाता आगे चल पड़ा। ईल्ली उसके पीछे थी।
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दीमक राजा और कैदी ईल्ली