बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

ईल्ली और एनाफिलीज सिस्टर

वाह! वाह! नानी, तुम्हारे यहां तो कीटाणु व्यापार की काफी संभावनाएं है।
इतने में पीछे से गूं-गूं की सुरीली आवाज आई। ईल्ली चौंकी।
‘‘नमस्ते रानी मक्खी। यह कौन मेहमान साथ लायी हो?’’
‘‘पराई कोई नहीं, मेरी बेटी की बेटी है एनाफिलीज सिस्टर।’’ एनाफिलीज नाम सुनकर ईल्ली को आश्चर्य हुआ।
‘‘यह कोई विदेशी नागरिक है?’’
‘‘नहीं बेटी, इसका सिर्फ नाम ही विदेशी है। इसके माता-पिता ने रख दिया जो चल रहा है। रहती यह हमारे देश में ही है। इसका और हमारा धन्धा एक ही है।’’
‘‘धन्धा एक ही है क्या मतलब? क्या ये भी कीटाणुओं की व्यापारी है?’’
‘‘हां, बस फर्क इतना है कि हम कई तरह के कीटाणुओं का व्यापार मौसम के अनुसार करती है किन्तु एनाफिलीज मच्छर केवल एक ही तरह के कीटाणुओं की व्यापारिन है। बरसात के मौसम में इसका धन्धा जोरों पर चलता है।
इसके पास एक ही कीटाणु है ‘मलेरिया पैरेसाईट’। बस उसी को पेट में लिए घूमती है।’’
‘‘पेट में नानी?’’
हां-हां पेट में। इसके आमाशय में कीटाणु अपना आधा जीवन पूरा करते है। फिर मनुष्यों तक पहुंचाने के लिए इसे उन्हें काटना पड़ता है। बड़े जोखिम का काम है।
कई बार बेचारी काटते वक्त पकड़ी जाती है। इसके कुछ चालाक साथी तो उड़ जाते है और कुछ बचारे बेमौत मारे जाते है।
‘‘बहन, एनाफिलीज कोई और तरीका क्यों नहीं ढूंढ लेती तुम कीटाणु पहुंचाने का। ‘‘ईल्ली ने एनाफिलीज से कहा। ‘‘कीटाणु मुझे मनुष्य के खून में पहुंचाने होते है। जो सिर्फ मेरे मुंह से लार द्वारा ही जा सकते है। इसके लिए पहले मनुष्य की त्वचा को भेदना होता है। फिर हमारा भोजन भी मनुष्य का खून ही है। खून चूसने के साथ ही हम अपनी लार के जरिए कीटाणु छोड़ देती है।’’
‘‘तुम्हारे धन्धे में बहुत खतरा है’’ ईल्ली बोली एनाफिलीज कहने लगी- ‘‘टी.वी. नहीं देखती तुम ? रोज नित नए डाकुओं के विज्ञापन मेरे विनाश के लिए निकलते रहते है। कभी ये लगाओ, कभी वो लगाओ। कभी ये जलाओ, कभी वो जलाओ। ऐसे भगाओ वैसे भगाओ जाने कितनी तरह की मुसीबतें हमें अकेले झेलनी पड़ती है।’’
‘‘अकेले क्यों बहन? क्या तुम्हारे घर के मर्द काम नहीं करते?’’
‘‘अरे नहीं, हमारे मर्द न काम के न काज के दुश्मन अनाज के सारे दिन फूलों और फलों का रस चूसते रहते है। सिर्फ अपना पेट भरने का काम करते है। पेटू कहीं के, कभी-कभी हमें भी फंसा देते है।
एक हम मादा एनाफिलीज ही हैं जो बच्चों की तरह कीटाणुओं को पेट में पालती भी है और धन्धा भी करती हैं।’’
‘‘इनके व्यापार की एक खास बात जानती हो ईल्ली, तुम?’’ इतनी देर से चुप बैठी नानी बोली।
‘‘वो क्या नानी?’’
एक बार जो यह एनाफिलीज बहन एक स्वस्थ आदमी को काट ले और अपने कीटाणु जिसे ये प्लाज्मोडियम कहती है, मलेरिया फैलाने में कामयाब हो जाये तो इसकी अन्य साथिन बहनें उसी बीमार आदमी का खून चूसकर वापस कई कीटाणुओं को अपने पेट में भर लाती है। फिर इसके आमाशय की दीवारों में वे कीटाणु अपना आधा जीवन चक्र पूरा करते है।’’
‘‘क्या मतलब नानी?’’
‘‘मतलब यह कि इसके कीटाणु आधा जीवन चक्र मनुष्य के शरीर में और आधा जीवन चक्र इसके शरीर में पूरा करते हैं।’’
‘‘सचमुच आश्चर्यजनक है इनकी व्यापार शैली।’’
‘‘हां ईल्ली नानी ठीक कह रही है। हमारी çजाति के और भी मच्छर होते है जो दूसरी तरह के कीटाणुओं के व्यापारी है।
‘‘कौन-कौन है? जरा, मुझे भी बताना।’’ ईल्ली ने कौतूहल से पूछा।
‘‘क्यूलेक्स और एडीस’’
‘‘क्या सभी मच्छरों के नाम अंग्रेजी में होते है।’’ ईल्ली ने पूछा।
‘‘हां, वैज्ञानिकों ने रख दिये है। ‘‘वैसे नाम से क्या फर्क पड़ता है अंग्रेजी के हो या हिन्दी के हमें तो अपने व्यापार से मतलब। क्यूलेक्स मच्छर, डेंगू ज्वर और फीलपांव के कीटाणुओं का व्यापारी है। एडीस के पास पीत ज्वर के कीटाणु मिलते है।
‘‘तुम रहती कहां हो एनाफिलीज?’’
‘‘वो वहां दूर दलदल में। दरअसल मुझे नम जगह बेहद पसन्द है। वहां मुझे अण्डे देने में सुविधा भी रहती है। अब तुम ही देखो न! मैं एक बार में करीबन दो सौ से लेकर चार सौ तक अण्डे देकर निश्चित हो जाती हूं। फिर यही दलदल उन्हें पालता है। यहीं मेरे अण्डो में से लार्वा निकलता है और लार्वा से प्यूपा बनता है। मुझे उन्हें संभालने नहीं पड़ते।
अब तुम ही बताओ बहन, व्यापार करूं या बच्चे संभालू? एनाफिलीज अपनी स्कर्ट ठीक करती हुई बोली, अच्छा अब चलती हूं। कहीं दुश्मनों ने देख लिया तो पकड़ कर मसल ही डालेंगे।
अच्छा! अलविदा बहन फिर कभी मिलेगे। कहकर वे जुदा हो गई।
ईल्ली को आज मच्छर जाति के बारे में रोचक बाते जानने को मिली। सोच रही थी घर जाकर उन्हें जल्दी से डायरी में उतार ले। अत: उसने नानी से घर चलने का अनुरोध किया और दोनों मक्खियां घर की ओर अड़ चली।
रात नानी तो सो गई पर ईल्ली लैम्प की मद्धिम रोशनी में आज की डायरी लिखने में व्यस्त हो गई। इस बीच वह कब सो गई उसे पता ही नहीं चला।
सुबह नानी ने ईल्ली को उठाया और उसके सामने नक्शा फैलाते हुए कहने लगी-
‘‘देखो ईल्ली यह हरे निशान वाली जगहों पर हमें अपने कीटाणुओं की बस्ती बसानी है। ताकि उनकी आबादी बढ़ाई जा सके। खतरों वाली सारी जगहों को मैंनें लाल घेरे में ले लिया है। ये वो निशान है जहां हमारे ऐजेन्ट काली वर्दी में तैनात रहेंगे।
अच्छा अब हम चलते हैं, मैंने आज का दिन अण्डे देने के लिए चुना है. . . . .

6 टिप्‍पणियां:

  1. आप का स्वागत करते हुए मैं बहुत ही गौरवान्वित हूँ कि आपने ब्लॉग जगत मेंपदार्पण किया है. आप ब्लॉग जगत को अपने सार्थक लेखन कार्य से आलोकित करेंगे. इसी आशा के साथ आपको बधाई.
    ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं,
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  2. हिंदी में लेखन के लिए स्वागत एवं शुभकामनाएं

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  3. आपका लेख पड्कर अछ्छा लगा, हिन्दी ब्लागिंग में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है, क्रपया आईये

    http://dilli6in.blogspot.com/

    मेरी शुभकामनाएं
    चारुल शुक्ल
    http://www.twitter.com/charulshukla

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  4. ati sundar bal upanyaas dekhkar behad khushi hui ki baccho ke liye koi to likh raha hain

    http/jyotishkishore.blogspot.com

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